ये गरीबी भी कितनी बुरी है
कोई अन्न बेकार करता थाली में
तो गरीब भूख मिटाने को खड़ा लाइन में
ये बारिश सबके लिए एक सी नहीं होती
अमीरों के लिए अच्छा मौसम
चाय-पकौड़ा साथ लाती
कहीं गरीब देखकर अपनी टपकती छत
सर पकड़ बैठा सोच रहा
कब रुकेगी ये बारिश
बारिश में लाइन में लगे
एक छोटे बच्चे को देख
जी भर आया, आँखें नम
ठंड से काँप रहा, कब से लाइन में खड़ा था
बेबसी झलक रही आँखों से
हाथ में खाली प्लेट लिए
भंडारे की लाइन में छोटी सी आस लिए
कब से भूखा होगा, चेहरा बता रहा था
ठंड से काँप रहा था कब से लाइन में खड़ा था
भूख भी कितना तोड़ देती है बचपन
मासूम आँखें लड़ रही हों जैसे
कुछ मिले जल्दी से तो भूख मिटे
इस लाइन में खड़े-खड़े तो आस मिटे
उफ! ये बारिश और उम्मीद
से भरी उसकी आँखें
डॉ वन्दना शर्मा*
*12/6/26*
---