काश हरकिसी की जिंदगी तबस्सुम होती
दर्द उम्रभर का नहीं होता, बस हरकोई मुस्कूरा रहा होता
सर पे सवार न कोई फिक्र होती
माथे की सलबटों का बोझ न उठा रहा होता
घर के हर बल्व बुझा देता, एक एक कर
एक एक कर जुगनूओं को घर बुला रहा होता
काश ख़्वाब तक हमारे बस में होते
आज चाँद, कल सितारों की महफिल का
लुत्फ उठा रहा होता
मैं लिखता बेखौफ समन्दर की रेत पर
तेज लहरों का सिलसिला न लगा होता