मैं और मेरे अह्सास
रूह का साया
रूह का साया भटकता फिरता है राहों में l
दीदार के लिए तड़पता फिरता है राहों में ll
उम्र गुज़र गई खुशी का इंतजार करते हुए l
निगहबानी को मचलता फिरता है राहों में ll
दिन तो कट जाता है खयालों में फिर रात को l
ख्वाबों मे दिल बहलाता फिरता है राहों में ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह