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archana

archana

@archanalekhikha
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“फूलों के साथ रहकर भी……
अपनी फितरत नहीं बदलते…
उनका काम ही है—
चुभना… और दर्द देना…”

“जब टेंशन में पत्नी बन गई तांत्रिक… और पति निकले CID 🤣🔥”

एक समय ऐसा आया…
घर में टेंशन ही टेंशन 😤
लोग मुझे ही गलत साबित करने में लगे हुए…
मैं इतनी परेशान कि दिमाग बोला —
“मैं जा रहा हूँ छुट्टी पर” 🧠✈️

तभी किसी ज्ञानी आत्मा ने एंट्री मारी —
👉 “पति-पत्नी की फोटो कांच की सीसी में रख दो… प्यार बढ़ेगा ❤️”

बस… मेरी अक्ल ने भी उसी टाइम छुट्टी ले रखी थी 😌
मैंने सोचा — “चलो यही सही!”

फिर क्या…
मैंने पूरा सीक्रेट ऑपरेशन चालू किया 🤫
फोटो ली, सीसी में डाली, ढक्कन बंद…
और अलमारी के ऐसे कोने में छुपाई…
जहाँ आम इंसान तो क्या… खुद भगवान भी न ढूंढ पाए 😎

लेकिन…
मैं भूल गई थी कि मेरा पति कोई आम इंसान नहीं है…
👉 वो “CID स्पेशल एडिशन” हैं 🔍🤣

घर में एक पिन भी गुम हो जाए…
तो 5 मिनट में बरामद कर देते हैं 😭

और वही हुआ…
जनाब ने अलमारी का पोस्टमार्टम कर डाला 🕵️‍♂️
और निकाल ली वो “सीक्रेट सीसी” 😳

फिर शुरू हुआ इंटरोगेशन —
“ये क्या है?”
“इसमें क्या बंद किया है?”
“कौन सा नया नाटक चल रहा है?” 😡

मैं अंदर से — डर 💀 + हंसी 🤭 + पछतावा 😭
सब एक साथ महसूस कर रही थी…

पहले तो मैंने गोल-गोल जवाब दिए…
सोचा शायद बच जाऊं 😅
लेकिन सामने वाला भी CID निकला भाई 😭

आखिरकार… मैंने हिम्मत जुटाई 😤
और बोल ही दिया —

“देखो… फोटो भी तो आपकी ही रखी है ❤️
किसी और की भी रख सकती थी… पर नहीं रखी 😏
👉 क्योंकि मैं आपसे प्यार करती हूँ… इसलिए आपको ही कैद किया है 🤣”

बस फिर क्या…
उनका गुस्सा — 📉
और मेरा आत्मविश्वास — 📈🤣

वो बोले —
“इतनी मूर्खता! ये सब करने की जरूरत क्या है?” 🤦‍♂️

और मैं मन ही मन —
👉 “प्यार बढ़ाने का शॉर्टकट भी फेल हो गया 😭😂”

वैसे मैं इन सब चीजों पर बिल्कुल विश्वास नहीं करती… 😌
लेकिन कहते हैं ना… जब इंसान परेशानी में होता है,
तो कभी-कभी दिमाग नहीं… दिल फैसले ले लेता है 💔😅

और उस वक्त…
मैंने भी वही छोटी-सी मूर्खता कर दी 🤭

अब सोचती हूँ…
👉 ऑनलाइन नुस्खों से नहीं,
सीधी बात और समझदारी से ही रिश्ते संभलते हैं ❤️

बाकी…
थोड़ी-बहुत पागलपन वाली हरकतें ही
ज़िंदगी को यादगार बना देती हैं 😂✨

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उस वक्त… मेरा साथ देने वाला कोई नहीं था।
जब मेरा शरीर दिन-ब-दिन कमजोर हो रहा था…
वजन गिरता जा रहा था…
हड्डियाँ दिखने लगी थीं…
तब भी… मैं मुस्कुराती रही।
हँसती रही…
ताकि मेरे बच्चों को महसूस न हो कि उनकी माँ अंदर से कितनी टूट रही है।
घर संभालना…
बच्चों को संभालना…
और ऊपर से ताने सुनना…
"नाटक कर रही है…"
"कुछ नहीं हुआ इसे…"
यहाँ तक कि… मेरी अपनी सास ने भी कभी समझने की कोशिश नहीं की।
बस एक ही शब्द—
"नाटक"
दिल तब टूटता है…
जब दर्द शरीर में नहीं…
रिश्तों में होने लगे।
मैं सोचती थी…
आखिर कोई इंसान ऐसा नाटक क्यों करेगा…
जिसमें उसका शरीर ही जवाब दे रहा हो?
सबसे ज्यादा चुभी वो बात…
जो मैंने अपने ही कानों से सुनी—
"मर भी जाएगी… तो क्या फर्क पड़ेगा…"
उस दिन समझ आ गया…
सच में… यहाँ कोई किसी का नहीं होता।
मेरा बीपी इतना बढ़ जाता था कि
200… 220… कभी 240 तक पहुँच जाता था…
सोचो उस हालत में भी मैं
घर, बच्चे… सब संभाल रही थी।
मैं पिछले 5–6 सालों से बीमार थी…
शायद इसलिए…
उन्हें मैं एक बोझ लगने लगी थी।
लेकिन फिर…
शायद किस्मत मुझे यहाँ ले आई—
लिखने के लिए।
मैंने लिखना शुरू किया…
और धीरे-धीरे… मेरा मन शांत होने लगा।
अगर मैं यहाँ नहीं आती…
तो शायद आज मैं टूटकर बिखर चुकी होती।
शायद… जी भी रही होती या नहीं…
ताने ऐसे मिलते थे…
जैसे मैं कोई इंसान नहीं…
एक बोझ हूँ।
लेकिन आज…
मैं खड़ी हूँ।
टूटी नहीं हूँ

"मैं नाटक नहीं कर रही थी…
मैं हर दिन खुद को बचा रही थी।"

"बीमार शरीर से ज्यादा…
लोगों की सोच ने मुझे तोड़ा था।"

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पता है… मैं जब भी किसी की पोस्ट देखती हूं ना… ❤️
तो बस ऐसे ही लाइक नहीं करती…
मैं ये सोचकर लाइक करती हूं कि…
पता नहीं वो इंसान किस हालात में होगा…
शायद उसे मेरी एक लाइक से थोड़ी खुशी मिल जाए… ✨
क्योंकि सच तो ये है…
मेरे पास पैसे नहीं हैं…
कि मैं किसी की बड़ी मदद कर सकूं… 💔
पर दिल से मदद तो कर सकती हूं ना…
इसलिए मैं हर पोस्ट को दिल से लाइक करती हूं…
और यही सोच लेती हूं…
कि इससे बड़ा दान मेरे लिए क्या हो सकता है… ❤️
हां… ताने भी मिलते हैं…
“खुद फ्री का खाती है…” 😔
पर कोई नहीं…
जब ऊपर वाला मुझे काबिल बनाएगा…
तब शायद मैं सच में किसी की बड़ी मदद कर पाऊंगी…
अभी के लिए…
मेरी हर लाइक… मेरी तरफ से एक छोटी सी दुआ है… ✨

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**“फिलहाल मुझे भी किसी भी क्षेत्र में सफलता नहीं मिली है…
पर मैं रुकी नहीं हूँ… मैं कोशिश कर रही हूँ…
शायद अभी मैं सिर्फ लिख रही हूँ…
शायद अभी कुछ बड़ा नहीं हो रहा…
पर मेरे अंदर एक उम्मीद है…
कि एक दिन यही कोशिश रंग लाएगी…
बस एक दुआ है—
मुझे उन लोगों के सामने कभी शर्मिंदा न होना पड़े…
जो आज मेरा मजाक बना रहे हैं… ❤️✨”**

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समाज में कई लोग यह समझते हैं कि अगर कोई इंसान बहुत कष्ट सह ले, अपमान सह ले और फिर भी चुप रहे,
तो वह बहुत संस्कारी है।
लेकिन सच्चाई यह है कि किसी को कष्ट देना और फिर उसकी सहनशीलता की तारीफ करना, यह इंसानियत नहीं है।
किसी को दुख देकर हम कैसे खुश रह सकते हैं?
अगर मैं ही किसी को कष्ट दूँ और फिर कहूँ कि “देखो, यह कितना संस्कारी है, सब सह लेता है”,
तो यह संस्कार नहीं बल्कि अन्याय है।
भगवान सब देखता है।
जो इंसान दूसरों को कष्ट देता है, उसे अपने कर्मों का फल जरूर मिलता है—
चाहे देर से ही सही।
इसलिए किसी पर निर्णय देने से पहले सौ बार सोचना चाहिए।
हो सकता है कि जिसकी हम आलोचना कर रहे हैं,
उसकी परिस्थिति और दर्द हमें दिखाई ही न दे रहा हो।
सच्चा संस्कार तो यह है कि हम किसी को दुख न दें,
बल्कि उसकी स्थिति को समझने की कोशिश करें।

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दिमाग…
एक ऐसी प्रयोगशाला,
जहाँ सिर्फ विचार नहीं,
पूरी-पूरी दुनियाएँ जन्म लेती हैं।
और जब यही दिमाग किसी लेखक का होता है,
तो ये प्रयोगशाला और भी खास बन जाती है…
लेखक का दिमाग कभी शांत नहीं रहता।
वो हर पल कुछ सोचता है,
कुछ गढ़ता है,
कुछ महसूस करता है…
कभी हँसी के दृश्य बनते हैं,
कभी आँसुओं की कहानी,
कभी एक मासूम किरदार जन्म लेता है,
तो कभी एक दर्द भरी दास्तान।
लेखक जब लिखने बैठता है,
तो वो सिर्फ शब्द नहीं लिखता…
वो अपने दिमाग की प्रयोगशाला में
नए-नए प्रयोग करता है।
सोचता है —
आज कौन सा किरदार जन्म लेगा?
कौन सी कहानी दिलों को छुएगी?
क्या नया होगा, जो पहले कभी नहीं हुआ?
कभी उसका दिमाग उसे आसमान तक ले जाता है,
तो कभी धरती के सबसे गहरे दर्द तक…
कभी वो कल्पना में उड़ता है,
तो कभी हकीकत से लड़ता है।
यही दिमाग की प्रयोगशाला है,
जो मनगढ़ंत कहानियाँ भी बना सकती है,
और सच्चाई को आईना भी दिखा सकती है।
कभी यही दिमाग ओवरथिंकिंग में उलझ जाता है,
पर यही उसकी ताकत भी है…
क्योंकि जो ज्यादा सोचता है,
वही कुछ नया रचता है।
जैसे वैज्ञानिक अपनी प्रयोगशाला में
नई खोज करता है,
वैसे ही लेखक अपने दिमाग में
नई दुनिया बना देता है।
लेखक का दिमाग ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है…
यहीं से शब्द जन्म लेते हैं,
और शब्दों से कहानियाँ…
और कहानियों से जुड़ती हैं भावनाएँ।
यही प्रयोगशाला एक साधारण इंसान को
“लेखक” बना देती है…
और उसी लेखक के शब्द,
किसी के दिल तक पहुँच जाते हैं। ✨

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**“कुछ महीने पहले…
मेरे बाल लगभग चले गए थे।
आज छोटे-छोटे बाल वापस आए हैं…
शायद किसी के लिए ये छोटी बात हो,
पर मेरे लिए ये बहुत बड़ी जीत है। ❤️
हाँ, मेरा ट्रीटमेंट अभी भी चल रहा है…
जैसे ही दवाई छोड़ती हूँ,
वही परेशानी फिर लौट आती है—
खुजली, बाल झड़ना, दर्द…
डॉक्टर भी अभी पूरी तरह समझ नहीं पाए हैं,
पर मैं हार नहीं मानी हूँ।
महंगी दवाइयाँ भी चल रही हैं,
और साथ में लोगों के ताने भी—
पर अब मैंने सीख लिया है,
दर्द से लड़ना… चुप रहकर भी मजबूत रहना।
मेरे बाल अभी थोड़े-थोड़े हैं,
टूटते भी हैं…
लेकिन हर नया बाल मुझे ये याद दिलाता है—
मैं हार नहीं रही, मैं ठीक हो रही हूँ। ✨
एक दिन सब ठीक होगा…
और मैं फिर से मुस्कुराऊँगी,
पूरे आत्मविश्वास के साथ।”** ❤️

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मैंने कई जगह देखा है—चाहे कुछ घरेलू महिलाएँ हों या कम पढ़ी-लिखी महिलाएँ—
वे अक्सर उन महिलाओं को गलत समझ लेती हैं जो साफ-साफ और तर्क के साथ अपनी बात रखती हैं।
अगर कोई महिला समझदारी से, स्पष्ट शब्दों में अपनी बात कह दे,
तो उसे जल्दी ही “बहुत बोलने वाली” या “बदतमीज़” कह दिया जाता है।
जबकि सच्चाई यह है कि साफ और तर्क के साथ बात करना बदतमीज़ी नहीं, बल्कि समझदारी की निशानी है।
कई बार लोग उस बात को समझ नहीं पाते जो उनकी सोच से अलग होती है,
इसलिए वे उसे गलत नाम दे देते हैं।
लेकिन सच यही है कि
ज्ञान और समझ रखने वाला व्यक्ति अपनी बात स्पष्ट कहता है,
और जो सुनने की आदत नहीं रखते, उन्हें वही बात बुरी लगती है।
- archana

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कौन कहता है चरित्र कॉपी नहीं होता,
यहां लोग चेहरों के साथ किरदार भी बदल लेते हैं…
बातों और व्यवहार की नकल करके,
अच्छाई का दिखावा कर लेते हैं…
इंस्टाग्राम की रीलों से सीखकर,
संस्कारों का नकाब पहन लेते हैं…
पर सच तो ये है —
चेहरा बदल जाता है,
पर दिल कभी कॉपी नहीं होता… 💔

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