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मेरी चूड़ियों में जितना रंग सजा है ना… उतना ही रंग आज तुम पर चढ़ाऊँगी। इतना गहरा रंग होगा कि न पानी छुड़ा पाएगा, न वक्त मिटा पाएगा… और याद रखना — ये किसी और का नहीं, सिर्फ मेरे सुहाग का रंग है।” 💫
✨ “आख़िर बहू ही बुरी क्यों?” ✨ बहू बुरी नहीं होती… बस वो सबकी उम्मीदों का जोड़ नहीं बन पाती। ससुराल में हर व्यक्ति की अपनी सोच होती है, अपना नजरिया, अपनी कल्पना— किसी को संस्कारी बहू चाहिए, किसी को कम बोलने वाली, किसी को कमाने वाली, किसी को सेवा करने वाली, और किसी को बस चुप रहने वाली… पर एक इंसान सबके दिमाग की बनाई तस्वीर कैसे बन सकता है? जब बहू उन सब “अलग-अलग दिमागों” से मेल नहीं खाती, तो उसे नाम दे दिया जाता है— “बुरी बहू”। सच तो ये है— बहू सिर्फ ससुराल में बुरी कहलाती है। मायके में वही बेटी अच्छी होती है। दोस्तों में वही सच्ची होती है। मोहल्ले में वही मुस्कुराती हुई दिखती है। लेकिन घर के अंदर… छोटी सी बात को बड़ा बना दिया जाता है, आधी बात को पूरा कर दिया जाता है, और फिर मोहल्ले में कहानी सुनाई जाती है— “बहू बहुत बुरी है…” इतना झूठ, इतनी सजावट, इतना बढ़ा-चढ़ा कर बयान— कि सच कहीं कोने में चुप बैठ जाता है। क्योंकि सच बोलने के लिए हिम्मत चाहिए… और कहानी बनाने के लिए बस ज़ुबान “बहू बुरी नहीं होती, वो बस सबकी अलग-अलग उम्मीदों में फिट नहीं बैठ पाती।” - archana
होली का रंग तेरे बिन सब बैरंग है, हाथों में गुलाल है मगर दिल तंग है। भीड़ में हँसते हैं लोग चारों ओर, पर मेरी हर मुस्कान के पीछे तेरा ही जंग है।
कई बार बेड़ियाँ लोहे की नहीं होतीं, वो सोच की होती हैं। और दुख की बात ये है कि कभी-कभी वही सोच एक औरत दूसरी औरत को दे देती है। “हमने सहा था, तुम भी सहो…” ये वाक्य दरअसल दर्द की विरासत है। जिसने खुद अन्याय सहा, वो उसे गलत मानने के बजाय उसे “परंपरा” मान बैठी। क्यों? क्योंकि अगर वो मान ले कि उसके साथ गलत हुआ था, तो उसे अपनी पूरी जिंदगी का सच देखना पड़ेगा। और वो बहुत तकलीफ़ देता है। इसलिए कई औरतें अपने जख्मों को संस्कार का नाम दे देती हैं। और फिर अगली पीढ़ी को भी वही सिखाती हैं — “चुप रहो तो अच्छी हो।” “सहन करो तो इज्ज़त मिलेगी।” लेकिन सच्चाई ये है — सहन करना अच्छाई का पैमाना नहीं है। अत्याचार को रोकना ही असली हिम्मत है। अच्छी बहू या पत्नी वो नहीं जो मार खाकर भी मुस्कुराए, बल्कि वो है जो सम्मान से जीना सीखे और दूसरों को भी सिखाए। समस्या औरत नहीं है, समस्या वो सोच है जो पीढ़ी दर पीढ़ी चलती रही। और बदलाव भी एक औरत से ही शुरू होगा — जो कहेगी, “मेरे साथ जो गलत हुआ, वो मैं अपनी बेटी या बहू के साथ नहीं होने दूँगी।” - archana
हम पुरानी सोच के हैं आजकल प्रेम को आज़ादी का नाम दिया जाता है। प्रेमी बनना, फिर प्रेम छोड़ देना, और बाद में किसी और का पति या पत्नी बन जाना — इसे ही आधुनिक सोच कहा जाता है। पर हम पुरानी सोच के हैं। और इस पर हमें कोई शर्म नहीं। हमने प्रेम के नाम पर कभी अपने शरीर को किसी की वस्तु नहीं बनने दिया। न किसी को अधिकार दिया, न किसी को छूने दिया — सिवाय उस इंसान के जो हमारा होने वाला पति होगा। प्रेम करना गलत नहीं है, लेकिन प्रेम के नाम पर मर्यादा खो देना हमें स्वीकार नहीं। आज कहा जाता है — “पहले प्रेमी बनो, फिर पति या पत्नी बन जाना।” लेकिन किसी का हक़ मारकर अपना सुख बनाना हमारी संस्कारों में नहीं। हम अपने धर्म के मार्ग से नहीं हटेंगे अगर हमारा होने वाला पति या हम, उसकी होने वाली पत्नी— कभी प्रेम के नाम पर किसी और से जुड़ाव रख चुके हों, तो वह उनका कर्म है। उसे वे स्वयं सँभालेंगे, या उसी का फल झेलेंगे। हम किसी के अतीत पर फैसला सुनाने नहीं बैठे। हर इंसान अपने कर्मों का खुद उत्तरदायी होता है। लेकिन एक बात बिल्कुल साफ़ है— हम अपने धर्म के मार्ग से नहीं हटेंगे। प्रेम के नाम पर गलत कदम उठाना हमारी सोच नहीं। किसी का अधिकार छीनकर अपना घर बसाना हमें स्वीकार नहीं। आज अगर इसे “पुरानी सोच” कहा जाता है, तो कहते रहो। कम से कम इतना सुकून तो है कि हमने अपनी मर्यादा, अपना आत्मसम्मान और अपना धर्म कभी नहीं छोड़ा। अच्छा जीवनसाथी न लव मैरिज से तय होता है, न अरेंज मैरिज से। सब कुछ परिस्थितियों, कर्मों और भाग्य का खेल है। हम अपने हिस्से का धर्म पूरी निष्ठा से निभाएँगे। बाक़ी, हर किसी को अपने कर्मों का उत्तर खुद देना होगा।
सिर्फ़ तू… (एक पत्नी का प्रेम) इश्क़ भी तू, हक़ भी तू, मेरी हर सांस का सच भी तू… दुनिया चाहे सवाल उठा ले मुझ पर, मगर मेरे माथे की बिंदी की कसम, मेरी पहचान सिर्फ़ तू… तेरे इंतज़ार में वक़्त थक जाए, पर मेरी वफ़ा कभी न थके… मैं पत्नी हूँ, कोई कमज़ोरी नहीं, तेरे नाम की सबसे बड़ी ताक़त हूँ… तेरे लिए चुप रहना भी इबादत है मेरी, और अगर ज़रूरत पड़े, तो तेरे लिए पूरी दुनिया से लड़ जाना भी आता है मुझे… तेरे सिवा किसी को हक़ नहीं मेरे ख़्वाबों तक आने का, क्योंकि मेरा हर ख़्वाब तेरे नाम लिखा है… आग लगती है जब लोग कहते हैं — “पत्नी सिर्फ़ निभाती है” अरे साहब, पत्नी अगर चाहे तो पूरी ज़िंदगी जला कर रौशन कर दे… 🔥
“चेहरे पर ठहरने वालों से रूह की उम्मीद मत रखना। मोहब्बत अगर सच्ची हो तो रूह तक उतरती है। वरना खूबसूरत जुमलों के पीछे अक्सर खेल सिर्फ़ जिस्म का होता है।”
“वह सोचता है कि अंधेरे में मुझे रोक कर खुश है… पर मैं उसे दिखा रही हूँ — हाँ, मैं अंधेरे में हूँ, पर सब पता है मुझे। सब समझ चुकी हूँ।” - archana
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