मुझे सुधा बहुत पसंद है
सिर्फ धर्मवीर भारती के *गुनाहों के देवता* के चन्दर वाली सुधा नहीं।
वो तो देवी है अपने भीतर अथाह प्रेम और समर्पण वाली देवी...प्रेम त्याग कर अमर बन गई
पर मुझे मुंशी प्रेमचंद के उपन्यास *निर्मला* कि सुधा उससे भी ज्यादा पसंद है।
वो एक ऐसी स्त्री है जिसने दूसरी स्त्री को समझा
उसका साथ दिया।
निर्मला का मंगेतर जो कि बाद में सुधा का पति बना
उसने निर्मला से सिर्फ दहेज के लिए शादी से इनकार कर दिया।
ये जानने के बाद भी उसने निर्मला से अपनी मित्रता खत्म नहीं की और ना ही कभी उसे हीन नजरों से देखा।
उसके लिए निर्मला सदैव एक पूजनीय छवि रही।
अपने पति का पक्ष न लेकर उसने निर्मला के साथ हुए अन्याय के खिलाफ बात कही
और भी सुधा के चरित्र में बहुत खूबियां रही।
उसने मित्रता में सब न्योछावर किया।
सच में सुधा बहुत पसंद है मुझे।
दोनों ही उपन्यास में सुधा औरत की अपनी परिभाषा को चरित्रार्थ करती नजर आती है।