जिसे तुम जिंदगी कहते हो
कविता
इन्हें दफनाना कहते हैं
इन्हें मर जाना कहते हैं
जिन्हें तुम जिंदगी कहते हो
उन्हें सुली चड़ जाना कहते हैं
बिना भाऊ के जिन को
कहां जिना कहते हैं
जीने तुम जिंदगी समझते हो
उन्हें मर जाना कहते हैं
अगर दिल जिंदा ना हो तो
जीने का क्या मजा
और मरने का क्या स्वाद
रुह को दफना दिया तूने खुद के अंदर
और यह जिस्म दफनाने का क्या मजा
जो मिल जाए जिंदगी में
शौक से खेरात समझ के रख लो
तुम भाव से सबको अपनाओ
जब प्यार नहीं तेरे दिल में तो
तो ईने मरना कहते हैं
जिसे तुम जिंदगी कहते हो
उन्हें सूली चढ़ जाना कहते हैं
खाली बंजारा रहे सुखी नदियां
सुख दे नहीं सकते
तुम जी भर के जी भी नहीं सकते
तुम जी भर के मर भी नहीं सकते
तो तेरा क्या जीना
राहों पर अपना कदम क्यों बढ़ता
जब बाहा ही नहीं अल्हड़ पुरवाई हवा बन के
तूने बहारों की खुशबू क्भी लिया ही नहीं
पंछी की तरह आजाद हवा बन के
मनमानी कि याही नहीं
तुम जिन्हें जिंदगी कहते हो
उसमें दया भरा ही नहीं
हया छिपा ही नहीं
और जिस में दया हाया है ही नहीं
उन्हें पत्थर बन जाना कहते हैं
उन्हें मर जाना कहते हैं
जिसे तुम जिंदगी कहते हो
उन्हे वीराना कहते हैं
जिन्हें तुम बचाना कहते हो
उन्हें लुट जाना कहते हैं
जिंदा होना बलखाती राहों को कहते हैं
और इंसान होना दया से भर जाने को कहते हैं
और जिंदगी जिंदा दिलो को कहते हैं