> **चल पड़े हैं आज हम, आख़िरी सफ़र की ओर,**
> **पीछे छूटते जा रहे हैं सारे शहर की ओर।**
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> **जो कभी अपने थे, अब धुंधले से लगते हैं,**
> **वक़्त ले गया सबको किसी और डगर की ओर।**
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> **थक गई हैं चाहतें, बुझ गए हैं ख़्वाब सारे,**
> **दिल भी अब नहीं करता किसी नए असर की ओर।**
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> **एक ख़ामोशी मुसाफ़िर बन के साथ चलती है,**
> **जैसे रूह बढ़ रही हो अपने ही घर की ओर।**
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> **ना शिकायतें बचीं, ना कोई आरज़ू बाकी,**
> **बस कदम बढ़ते रहे आख़िरी सफ़र की ओर…**