Hindi Quote in Poem by Puneet Katariya

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पिंजरों की इस भीड़ में, पंखों की फरफराहट सुनता हूँ,
बेबसी के इस बाज़ार में, आज़ादी बिकती देखता हूँ।
हम देखते हैं उन्हें, शायद इनमें खुद को ही ढूंढते हैं...
चंद सिक्कों के गुरूर में, किसी बेज़ुबान का पूरा आसमान लूटते हैं।
​कीमत लगाई है इनके रंगों की, और इस फरेब को हम 'मोहब्बत' कहते हैं,
पंख कतर कर इन मासूमों के, हम इंसान खुद को खुदा समझ लेते हैं।
​गर इश्क होता सच में इनकी रूह से, तो इनकी बेखौफ परवाज़ से प्यार करते,
यूँ लोहे की सलाखों में सजाकर, अपनी खुदगर्ज़ी का व्यापार न करते।
​इश्क़ तो मुकम्मल आसमान देता है, वो कभी जंजीरों में नहीं पलता,
किसी की ज़िंदगी को कैद करके, कभी किसी का सुकून नहीं संवरता।

Hindi Poem by Puneet Katariya : 112023391
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