।। …सुगंध का इनकार… ।।
कभी-कभी
सुगंध भी
सीधी राह नहीं चलती—
वह आती है
धीमे-धीमे,
मानो कोई पुरानी स्मृति
अपने ही अस्तित्व पर
प्रश्न कर रही हो।
वह महकती नहीं—
टकराती है,
नाक से नहीं,
मन के उस गहरे कोने से
जहाँ सड़ांध ने
घर नहीं,
अधिकार जमा रखा है।
और तब
सुगंध
सांत्वना नहीं देती—
वह विचलित करती है।
जैसे
कोई शांत चेहरा
अचानक पूछ बैठे—
“क्या सचमुच सब ठीक है?”
हम पीछे हटते हैं—
उससे नहीं,
उसके भीतर छिपे सत्य से।
क्योंकि
सड़ांध में जीना सरल है,
वह हमें
हमारी आदतों की सीमा में
सुरक्षित रखती है—
पर
सुगंध…
वह उस सुरक्षा को
धीरे-धीरे तोड़ती है,
बिना किसी शोर के।
मानो
भीतर कहीं
एक दीवार ढह रही हो,
और उसकी ध्वनि
केवल हमें सुनाई दे रही हो।
तब
नेत्र सजल नहीं होते—
वे ठहर जाते हैं,
जैसे जल भी
निर्णय कर रहा हो
कि बहना उचित है या नहीं।
और तुम—
तुम खड़े रहते हो
दो गंधों के बीच—
एक
जो तुम्हें यथावत बनाए रखती है,
और एक
जो तुम्हें परिवर्तित करना चाहती है।
यही
सुगंध का प्रतिरोध है—
वह
महककर नहीं,
असहज कर
अपना कार्य पूर्ण करती है।
— Anup Ashok Gajare