अनगिनत ख्वाहिशें हो सकती हैं मुझमें
मगर! मैं ख्वाहिश में नहीं हूँ!
है अंतर में कुछ सूखा
कुछ बिखरा सा
बिखरी हूँ मैं भी
सिमटू तो ही देखूँ
खुद का प्रतिबिंब
देखूँ तब अपने नैन-
नक्श कुछ पढ़ पाऊँ मैं खुद को भी
जानूँ फिर है क्या माँग मेरी
थी तरस कहाँ क्यों कहीं छिपी,,,,,
- Ruchi Dixit