मैं और मेरे अह्सास
जिंदगी
जिंदगी की अहमियत को समझा ही नहीं l
गहराईयाँ औ बारीकी को जाना ही नहीं ll
सहरा में रेत फ़िसलती वैसे ही जिंदगी गई l
रात दिन वक्त का हिसाब पहचाना ही नहीं ll
कुछ अपनी कुछ अपनों के लिए गुजरी कि l
प्यार को नशीले लम्हों से सजाया ही नहीं ll
"सखी"
डो. दर्शिता बाबूभाई शाह