दुश्मनी भी वो इस कदर निभा रहे हैं
ना दिल से जा रहें हैं ना वापस आ रहे हैं।
दिल तोड़ कर भी तुझे सब्र ना मिला
जो मेरे सुकून ओ चैन को रहा चुरा।
वादों पर तेरे ऐतबार करना थी मेरी खता
प्यार को प्यार मिले ऐसा कहां लिखा।
दिलों के आशियाने जब तक उजड़ते रहेंगे
टूटे दिलों से मयखाने यूं ही गुलजार रहेंगे।
हर राह गुजरे तेरी गली से ये जरूरी तो नहीं
मुड़कर देख जरा आज भी हूं मैं वहीं खड़ी।
शिकायतों की भी एक तहजीब होती है
जिससे हो गिला जुबां वहीं खामोश रहती है।
सरोज प्रजापति ✍️
- Saroj Prajapati