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Ritu kumari

Ritu kumari

@ritukumari509471
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यह जो गहरा सन्नाटा है,
मुझसे कुछ कहने आता है।
दिन भर तो बहल गया यह दिल,
रात होते ही क्यों घबराता है?
​तारों की महफ़िल जलती है,
रोशनी दूर कहीं ढलती है।
अंधेरे में छुपकर रोने की,
पुरानी आदत अब चलती है।
​ख्वाब जो देखे थे आँखों ने,
कांच से बनकर टूट गए।
हम वहीं खड़े हैं तनहा से,
हमसफर जो राहों में छूट गए।

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💔दिल उदास हो तो,
दुनिया की रौनक जहर लगती है!!
- Ritu kumari

This is just for my God.
- Ritu kumari

उदास दिल की ख़ामोशी में, ढूँढो मत अब कोई वजह,
बीत गई जो काली रातें, ढलने लगी है हर सुबह।
आँखों में जो ठहरे आँसू, बह जाने दो राहों में,
सब कुछ खोकर भी मिलता है, नया सफ़र निग़ाहों में।
थमी हुई इस गहरी साँस को, आज ज़रा तुम आज़ाद करो,
जो टूट गया वो कल था यारो, आज नए दिन का आगाज़ करो।
- Ritu kumari

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हर एक साँस में छुपा हुआ एक नया फ़साना है,
ये रुक-रुक कर भी चलने का इक नाम ज़माना है।
ना इसकी कोई ज़ात प्रभु, ना इसका कोई धर्म हुआ,
जो सीने में महसूस हुई, बस वही आख़िरी मर्म हुआ।
​ग़म में ये भारी होती है, ख़ुशी में बहती हवा-सी,
दर्द मिले तो ये तड़पे, राहत में लगे दवा-सी।
जब-जब कोई मीत मिला, ये ज़रा तेज़ चलने लगी,
जब-जब कोई दीप बुझा, ये आहिस्ता ढलने लगी।
​बचपन की उस बेफ़िक्री में यह हँसती और मचलती थी,
चंचल-सी एक नदी जैसी हर पल यह बहती-चलती थी।
आई जवानी तो इसमें एक नया जुनूँ समाया था,
सपनों के पीछे भागते-भागते इसने ज़ोर लगाया था।
​फिर आई ठहराव की घड़ी, इसने सहसा विश्राम लिया,
दुनिया भर के इस शोर में चुपके से ईश्वर का नाम लिया।
​काँच का बर्तन है यह काया, साँसें इसकी डोरी हैं,
इसके बिन सब बातें झूठी, इसके बिन सब चोरी हैं।
जब तक यह आती-जाती है, जीवन में रंग़-तरंग भरे,
इसके थमते ही यह जग सारा एक पल में निस्पंद करे।

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भीड़ में भी एक अकेलापन साथ चलता है,
जब दिल का कोई कोना चुपचाप जलता है।
मुस्कुराते हैं चेहरे पर मुखौटा लगा कर हम,
अंदर ही अंदर न जाने कितना कुछ ढलता है।
कुछ अनकहे शब्द थे, जो होठों पर ही जम गए,
जो कभी अपने थे, रास्तों में कहीं थम गए।
वक्त तो गुज़र गया अपनी रफ्तार से,
पर हम वहीं किसी पुरानी याद में थम गए।
ना कोई शिकायत है अब, ना कोई गिला है,
ज़िंदगी से जो मिला, वही हमारा सिला है।
काँच की तरह टूट कर भी बिखरते नहीं हम,
बस हर रोज़ थोड़ा और खामोश होते जाते हैं हम।
- Ritu kumari

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अपनी ही आस में एक चिराग जला रखा है,
ख़ामोश राहों पर एक मंज़र सजा रखा है।
ज़माने को लगता है कि मैं तन्हा हूँ यहाँ,
पर मैंने तो ख़ुद में ही एक जहाँ बसा रखा है।
​न किसी के आने की दस्तक़ का इंतज़ार है,
न ही अब दिल को किसी और का ख़ुमार है।
सब कुछ पा लिया मैंने ख़ुद को पाकर,
अब तो बस अपनी ही रूह से बेपनाह प्यार है।
​आँधियों को बहने दो, तूफ़ानों को आने दो,
मेरी ही उम्मीदों के चिराग को जगमगाने दो।
अब टूट कर बिखरने का ख़ौफ़ नहीं मुझे,
अपनी ही आस में अब मुझे मुस्कुराने दो।
- Ritu kumari

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अपनी ही राहों में गुमसुम चला हूँ,
किसी और की अब ख़वाहिश नहीं।
दिए बुझ गए हों भले राह के,
मुझे रौशनी की भी चाहत नहीं।
खुद ही में खोकर, खुद ही को पाया,
तलाश-ए-सफ़र में ठिकाना मिला।
जो बिखरे थे तिनके मेरी आस के,
उन्हीं तिनकों से एक आशियाना मिला।
न मंज़िल की परवाह, न खोने का डर,
अपनी ही चाह में बहता हुआ,
मैं अपनी ही दुनिया का रज़ादार हूँ,
अपनी ही ख़ामोशी में रहता हुआ।

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