किसी पर एक उंगली उठाने से पहले हमें यह याद रखना चाहिए कि हमारी बाकी चार उंगलियाँ हमारी ही ओर इशारा कर रही होती हैं। दूसरों की कमियाँ देखना और उन्हें कठघरे में खड़ा करना बहुत आसान है, लेकिन अपने भीतर झाँककर अपनी गलतियों को स्वीकार करना उतना ही कठिन। अक्सर हम दूसरों के व्यवहार का फैसला उनके एक पल को देखकर कर देते हैं, जबकि अपने जीवन की गलतियों के लिए परिस्थितियों और मजबूरियों का सहारा लेते हैं। इसलिए किसी को दोष देने से पहले स्वयं से पूछ लेना चाहिए कि क्या हम हर उस कसौटी पर खरे उतरते हैं, जिस पर दूसरे को परख रहे हैं।
जीवन की सुंदरता दूसरों में दोष खोजने में नहीं, बल्कि स्वयं को बेहतर बनाने में है। जो व्यक्ति अपनी कमियों को पहचानना सीख जाता है, उसके भीतर दूसरों के प्रति कठोरता कम और समझ अधिक पैदा होती है। उंगली उठाने के बजाय यदि हम वही हाथ किसी को संभालने के लिए बढ़ा दें, तो रिश्ते भी बचेंगे और मन की शांति भी बनी रहेगी। हम सब अपूर्ण हैं; इसलिए दूसरों को सुधारने से पहले स्वयं को सुधारना ही समझदारी है।