हम हमेशा यह चाहते हैं कि लोग हमें समझें, हमारी भावनाओं को पहचानें और उसे स्वीकार करें। लेकिन लोगों की सोच और उनकी अपेक्षाएँ हमेशा एक जैसी नहीं रहतीं। इसलिए यदि हम अपनी शांति और खुशी दूसरों की स्वीकृति पर निर्भर कर देंगे, तो जीवन भर असंतोष बना रहेगा। जरूरी यह नहीं कि हर कोई तुम्हें समझे, जरूरी यह है कि तुम स्वयं को समझो। अपनी भावनाओं, अपनी कमियों, अपनी खूबियों और अपनी सीमाओं को स्वीकार करना ही भीतर से मजबूत बनाता है। जब व्यक्ति स्वयं को समझ लेता है, तब उसे बार-बार दूसरों के प्रमाण की आवश्यकता नहीं रहती।
हमें हमेशा भीड़ की स्वीकृति ही क्यों चाहिए ? भीड़ की स्वीकृति अक्सर परिस्थितियों और समय के साथ बदलती रहती है, लेकिन स्वयं की स्वीकृति भीतर से मिलने वाली स्थायी शक्ति है। लोग आज तुम्हारी प्रशंसा कर सकते हैं और कल आलोचना भी, पर यदि तुम्हारा विश्वास अपने अस्तित्व और अपने निर्णयों पर कायम है तो बाहरी आवाजें तुम्हें विचलित नहीं कर सकतीं। सच्ची स्वतंत्रता दूसरों को प्रभावित करने में नहीं, बल्कि स्वयं को स्वीकार करके अपने रास्ते पर शांतिपूर्वक चलने में है। जब इंसान खुद के साथ सहज हो जाता है, तब वह समाज की भीड़ में रहते हुए भी अपनी पहचान और अपनी स्वतंत्रता को बनाए रखता है।