ये कैसा इंतज़ार है, जिसकी कोई मियाद नहीं,
हाथों में हाथ तो दूर, कोई वादा-ए-याद नहीं।
हम दीवाने खड़े हैं उस मोड़ पर आज भी,
जहाँ से गुज़रेगा तू, इस बात की कोई बुनियाद नहीं।
दहलीज़ पर दीया जलाकर हवा से लड़ते हैं,
तुझे सोचकर हम रोज़ खुद ही में बिखरते हैं।
ना कोई हक़ है मेरा, ना कोई शिकवा है तुझसे,
फिर क्यों तेरी आहट पे हम हद से गुज़रते हैं?
यह ख़ामोश सज़ा भी कमाल की है दुनिया में,
कि तुम मेरे नहीं, फिर भी हम तुम्हारे रहते हैं।
बिना उम्मीद की डोर के, यह कैसा बंधन है,
जिसे लोग इश्क़ और हम 'इंतज़ार' कहते हैं।