क्यों जन्मी थी वह बेटी, अगर यूँ ही जलाई जानी थी,
क्यों सपनों की डोली सजाकर, मौत के घर भेजी जानी थी।
हाथों में मेहंदी थी अभी, आँखों में छोटे-छोटे अरमान,
पर लालच की आग ने छीन लिया, उसका हँसता हुआ जहान।
ना कमी थी धन-दौलत की, ना भूखे थे वे लोग कभी,
फिर भी दहेज के भूखे मन ने, इंसानियत कुचल दी सभी।
हर रोज़ कहीं कोई बेटी, चुपचाप दफन कर दी जाती है,
कभी चूल्हे की आग में जलती, कभी फाँसी पर लटकाई जाती है।
माँ की गोद अभी भी रोती है, पिता का साहस टूट गया,
जिस बेटी को राजकुमारी माना, उसका जीवन ही लूट गया।
अब बेटियाँ आँसू नहीं, ज्वाला बनकर उठेंगी,
अपने सम्मान की खातिर, हर बेड़ी खुद तोड़ेंगी।
ना बिकेंगी दहेज के बदले, ना डरकर सिर झुकाएँगी,
वीरांगना बन इस धरती पर, अन्याय से स्वाति लड़ जाएँगी।
जिस दिन हर बेटी आत्मनिर्भर और निर्भय हो जाएगी,
उस दिन दहेज की ये काली प्रथा, खुद मिट्टी में मिल जाएगी