ज़रा खुद से भी मिलूँ
सबको खुश करते-करते, न जाने कब खुद से रूठ गए हम,दूसरों के जहान को सँवारते, खुद अंदर से टूट गए हम।उम्र भर दौड़ते रहे ज़माने की उम्मीदों के पीछे,आज आईने ने पूछा— "आख़िर कहाँ छूट गए हम?"अपनी पसंद का रंग कौन सा था, अब याद नहीं रहता,किस बात पर खिलखिलाते थे, अब वो जज़्बात नहीं रहता।औरों की ख्वाहिशों की ख़ातिर अपनी हर ज़िद को भुला दिया,फ़र्ज़ की इस लंबी दौड़ में, हमने खुद को ही गँवा दिया।चाय का कप हाथ में थामे, आज खिड़की पर बैठी हूँ,दुनिया की इस भीड़ में, मैं खुद का पता ढूँढती हूँ।बहुत जी लिए उनके लिए, जिन्हें हमारी कद्र तक नहीं,अब वक़्त है कि मैं अपने दिल की धड़कन सुनूँ।ज़रा ठहरूँ, ज़रा बैठूँ, ज़रा खुद से भी अब मिलूँ,जो अरमान दफन थे सीने में, उन्हें फिर से खिलने दूँ।परायों की महफ़िल से अब मुझे दूर ही रहना है,खुद का हाथ थामकर, अब मुझे खुद का होकर जीना है
लेखक _समीर खान