विचार ✨
आज समय फिर खेल खेल रहा है, फिर से वही पुरातन विचार !
क्यों उठते हो बार बार ,जब मैं हरा चुका कई बार !
क्या तुम्हारा अंत होगा कभी? शायद नहीं।
आज मन में फिर वही विचार उठा !
क्यों उठता है ये मन में, कि कुछ ठीक नहीं हैं।
क्या यह उचित विषय है, या मात्र विचार है।
क्यों उठता है ये मन में, कि मिटा दूं खुद को !
तुम कहते हो सब ठीक हैं, क्या वास्तव में सब ठीक है!
मेरे मिटने से अंततः सब ठीक होगा क्या?
अगर हॉ तो मिटाऊं खुद को, अगर न तो फिर क्यूं?
क्या ख़ुद की ओर जाने का सिर्फ यही एक रास्ता है?
ख़ुद को मिटा कर अगर शांति मिलेगी भी तो किसे ?
मैं विकल्प खोज रहा हूं देह में रहकर शांतमय होने का,
यात्रा जारी है.................................. ख़ुद की ओर।
- यथार्थ