अपने देश के नाम जान कुर्बान करते जवान, चाहे क्यों ना हो वह लहू-लुहान।।"
पीछे कदम नहीं हटाते हैं, चाहे क्यों ना देनी पड़े अपनी जान। मातृ-भूमि के लिए ही जन्मे हैं, मातृ-भूमि के लिए ही मर-मिट जाना है।
सालों से चली आ रही यह कुर्बानी की रीत, देश की खातिर कितनों ने गाई शहादत की गीत। जेल गए, पर फिर भी नहीं रुका यह खेल, नहीं रुका यह वीर जवानों की कुर्बानी का खेल।
पुलवामा और शौर्य का अध्याय
फिर बनी एक नई कहानी, उन चालीस (40) जवानों की अमर कुर्बानी। याद दिलाता है वह काला दिन, जब कितनों का उजड़ गया घर, और कितनों की उजड़ गई माँग का सिन्दूर।
पर फिर भी नहीं रुका कुर्बानी का खेल, शुरू हुई फिर से वीरता की एक नई जंग। दुश्मनों को दिया करारा जवाब, नाम दिया जिसे 'ऑपरेशन-सिन्दूर'।
अंतिम सलाम
आज उन वीर सपूतों को सर झुका कर करते सलाम, सर झुका कर करते हम सब उन्हें सलाम ! दुआ है, फिर से जन्म ले भारत माँ का ऐसा लाल, जो बुरी नज़र डालने वालों की उखाड़ ले खाल।
जय मातृ-भूमि ! जय हिन्द ! वीर जवानों को शत-शत सलाम !'