वो आंगन में जब चलती है, तो पायल शोर करती है,
ठिठक जाती है खामोशी, वो जब बातें करती है।
खुदा का नूर है वो, या कोई मासूम सी मूरत,
बिना बेटी के अधूरी है, हर एक घर की सूरत।
कभी वो तितलियों के पीछे, नंगे पाँव भागती है,
कभी रातों को जगकर, पिता की राह ताकती है।
वो जब स्कूल जाती है, तो बस्ता भारी होता है,
मगर उसके ही कंधों पर, घर का मान सारा होता है।
वो गुड़िया से खेलते-खेलते, कब बड़ी हो जाती है,
सयानी होकर माँ का, हाथ वो बंटाती है।
वो छोटी-छोटी बातों पर, जो जिद किया करती थी,
वही अब घर की मुश्किल में, ढाल बनकर खड़ी होती है।
पराया धन जिसे कहते हैं, वो खुद में एक दौलत है,
सिखाती है जो सबको प्रेम, वो पावन सी मूरत है।
एक घर में जन्म लेती है, दूसरे को संवारती है,
ये बेटियाँ ही तो हैं, जो दो कुलों को तारती है।
विदाई के उस मंजर पर, जब बाबुल का दिल रोता है,
तब समझ आता है कि, बेटी खोना क्या होता है।
मगर वो दूर जाकर भी, कभी रिश्ता नहीं खोती,
वो कितनी भी बड़ी हो जाए, पिता का गर्व है होती।
ऐ खुदा! हर एक बेटी को, तू खुशियों से सराबोर रखना,
उसके मासूम सपनों को, हमेशा तू हकीकत रखना।
न आए कभी उसकी आंखों में, दुख का कोई भी आंसू,
हर घर की इस बगिया को, तू हमेशा महकता रखना।
यह कविता बेटियों के प्रति प्रेम और सम्मान को दर्शाती है।