“मैं अभी भी खड़ी हूँ”
मैं हारकर भी हर बार,
खुद को समझा लेती हूँ,
दिल टूटता है रोज़ थोड़ा,
फिर भी मुस्कुरा देती हूँ।
कभी ख्वाब थे BHU के,
कभी DU की राहें थीं,
अब नंबरों के जंगल में,
बस उम्मीदें ही बाहें थीं।
वो जो कहते थे “छोड़ दो”,
मैं खुद को ही पकड़ लेती हूँ,
ना जाने क्यों हर बार,
मैं ही पहले call कर देती हूँ।
कमज़ोर नहीं हूँ मैं,
बस दिल थोड़ा सच्चा है,
जो चला गया, वो मेरा नहीं,
ये समझना अभी कच्चा है।
डर भी है, confusion भी,
और आँखों में सवाल बहुत,
पर अंदर कहीं एक आवाज़ है—
“तू कर सकती है, बस रुक मत।”
अगर ना मिला वो जो चाहा,
तो इसका मतलब खत्म नहीं,
रास्ते बदल सकते हैं,
पर मंज़िल का कोई अंत नहीं।
मैं टूटी हूँ, ये सच है,
पर खत्म नहीं कहानी,
मैं फिर से उठूँगी एक दिन—
और यही होगी मेरी असली जीत की निशानी।