तू… और मैं
तू बह(नदी) रही है, साथ मैं भी।
तू चल(समय) रहा है, साथ मैं भी।
तेरे संग बह रहा मेरा मन है,
तेरे संग चल रहा मेरा तन है।
तू नदी है—बहना तेरी नियति है।
तू समय है—चलना तेरी प्रकृति है।
तेरी नियति से मैंने बाँधी है डोरी,
तेरी प्रकृति से की है थोड़ी ज़ोराजोरी।
तेरी नियति का परिणाम—एक हो जाना है।
मेरी नियति का परिणाम—तूने भी तो जाना है।
तेरी प्रकृति है अनंता में जाना,
मेरी प्रकृति है अनंता में खो जाना।
तेरी और मेरी नियति में फिर भेद कहाँ?
तेरी और मेरी प्रकृति में फिर भेद कहाँ?
तू दृश्य है—वह परिवर्तन है।
मैं दृष्टा हूँ—यह अवलोकन है।
दृश्य और दृष्टा जब समान हो जाता हैं,
वही अवलोकन का परिणाम बन जाता है।
जहाँ तुम और मैं समान हैं,
यही अवलोकन का परिणाम है।
जहाँ दो नहीं, एक है—
वही तो अद्वैत है।
कपिल तिवारी "यथार्थ"