ऋगुवेद सूक्ति-- (४६) की व्याख्या-
"कृण्वन्तो विश्वमार्यम्"
ऋग्वेद-5/51/15
भाव--पूरे विश्व को आर्य(श्रेष्ठ) बनाओ।
मंत्र —
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्”
ऋग्वेद (5/51/15)
शाब्दिक अर्थ--
कृण्वन्तः = बनाओ / करो
विश्वम् = सम्पूर्ण संसार
आर्यम् = आर्य (श्रेष्ठ, सदाचारी)
भावार्थ:
“सम्पूर्ण विश्व को आर्य (श्रेष्ठ, सज्जन, संस्कारित) बनाओ।”
इसे गहराई से समझें--
यहाँ “आर्य” शब्द का अर्थ किसी जाति या नस्ल से नहीं है, बल्कि
श्रेष्ठ आचरण वाला,सत्यनिष्ठ
संस्कारित और उदार व्यक्ति।
इस मंत्र का संदेश है:
पूरी मानवता को नैतिक, सभ्य और उच्च जीवन मूल्यों वाला बनाना।
वैदिक दृष्टि--
यह मंत्र हमें सिखाता है कि—
केवल स्वयं के सुधार तक सीमित न रहें बल्कि समाज और विश्व के उत्थान के लिए कार्य करें। ज्ञान, संस्कार और सदाचार का प्रसार करें।
यही भावना आगे चलकर “वसुधैव कुटुम्बकम्” (सारा विश्व एक परिवार है) को साकार करती है।
वेदों में प्रमाण--
1. ऋग्वेद-- 10.191.2
संगच्छध्वं संवदध्वं सं वो मनांसि जानताम्।
भावार्थ:
मिलकर चलो, मिलकर बोलो, तुम्हारे मन एक समान हों।
अर्थ: सम्पूर्ण मानवता में एकता और समन्वय स्थापित करना — यही “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” है।
2. ऋग्वेद-- 1.89.1
आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः।
भावार्थ:
सभी दिशाओं से हमारे पास कल्याणकारी विचार आएँ।
अर्थ: पूरी दुनिया से अच्छे विचार ग्रहण करना और फैलाना।
3. यजुर्वेद-- 36.18
मित्रस्याहं चक्षुषा सर्वाणि भूतानि समीक्षे।
भावार्थ:
मैं सभी प्राणियों को मित्र की दृष्टि से देखूँ।
अर्थ: सबके प्रति मैत्री भाव — यही आर्यत्व (श्रेष्ठता) है।
4. अथर्ववेद-- 12.1.45
माता भूमिः पुत्रोऽहं पृथिव्याः।
भावार्थ:
यह पृथ्वी मेरी माता है और मैं उसका पुत्र हूँ।
अर्थ: समस्त पृथ्वी को अपना परिवार मानना।
5. अथर्ववेद-- 3.30.1
समानो मन्त्रः समिति: समानी...
भावार्थ:
तुम्हारे विचार, उद्देश्य और भाव एक समान हों।
अर्थ: समाज में सामंजस्य और एकता स्थापित करना।
निष्कर्ष--
इन सभी वैदिक मंत्रों का सार यही है कि—
सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार समझो। सभी के लिए कल्याणकारी सोच रखो।
मानवता में एकता, मैत्री और सदाचार स्थापित करो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का वास्तविक विस्तार है—
उपनिषदो में प्रमाण--
1. ईशोपनिषद् --1
ईशावास्यमिदं सर्वं यत्किञ्च जगत्यां जगत्।
भावार्थ:
इस सम्पूर्ण जगत में जो कुछ भी है, वह ईश्वर से व्याप्त है।
अर्थ: जब सबमें एक ही परमात्मा है, तो सबके प्रति श्रेष्ठ भाव रखना ही “विश्व को आर्य बनाना” है।
2. मुण्डक उपनिषद्-- 3.1.6
सत्येन पन्था विततो देवयानः।
भावार्थ:
सत्य के द्वारा ही देवयान (उच्च मार्ग) प्रशस्त होता है।
अर्थ: सत्य के मार्ग पर चलकर ही मनुष्य श्रेष्ठ बनता है और दूसरों को भी बनाता है।
3. कठोपनिषद्-- 1.3.14
उत्तिष्ठत जाग्रत प्राप्य वरान्निबोधत।
भावार्थ:
उठो, जागो और श्रेष्ठ ज्ञान को प्राप्त करो।
अर्थ: स्वयं जागरूक बनो और दूसरों को भी ज्ञान देकर श्रेष्ठ बनाओ।
4. छान्दोग्य उपनिषद-- 6.8.7
तत्त्वमसि (श्वेतकेतु)।
भावार्थ:
तू वही (ब्रह्म) है।
अर्थ: हर व्यक्ति में दिव्यता है—उसे पहचानकर जीवन को श्रेष्ठ बनाना ही आर्यत्व है।
5. बृहदारण्यक उपनिषद्- ---1.4.14
अहं ब्रह्मास्मि।
भावार्थ:
मैं ब्रह्म हूँ।
अर्थ: आत्मा की महानता को समझकर जीवन को उच्च बनाना।
6. तैत्तिरीय उपनिषद्-- 1.11.1
सत्यं वद, धर्मं चर।
भावार्थ:
सत्य बोलो, धर्म का आचरण करो।
अर्थ: यही श्रेष्ठ (आर्य) जीवन का मूल आधार है।
निष्कर्ष--
उपनिषदों का संदेश यही है कि—
आत्मज्ञान प्राप्त करो, सत्य और धर्म का पालन करो, सबमें एक ही ब्रह्म को देखो,और इस ज्ञान से सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्" का संदेश है।
पुराणों में प्रमाण--
1. विष्णु पुराण-- 1.19.41
वर्णाश्रमाचारवता पुरुषेण परः पुमान्।
विष्णुराराध्यते पन्था नान्यत्तत्त्वोषकारणम्॥
भावार्थ:
वर्णाश्रम धर्म का आचरण करने वाला मनुष्य भगवान विष्णु की आराधना करता है; यही श्रेष्ठ मार्ग है।
अर्थ: सदाचार और धर्मपालन से समाज को श्रेष्ठ बनाना।
2. भागवत पुराण-- 1.2.6
स वै पुंसां परो धर्मो यतो भक्तिरधोक्षजे।
अहैतुकी अप्रतिहता ययात्मा सुप्रसीदति॥
भावार्थ:
वह धर्म श्रेष्ठ है जिससे निष्काम भक्ति उत्पन्न हो और आत्मा प्रसन्न हो।
अर्थ: ऐसा धर्म अपनाना जो सबके कल्याण का कारण बने।
3. पद्म पुराण (सृष्टि खण्ड)
परोपकाराय पुण्याय पापाय परपीडनम्।
भावार्थ:
दूसरों का उपकार करना पुण्य है और दूसरों को पीड़ा देना पाप।
अर्थ: परोपकार से ही विश्व श्रेष्ठ बनता है।
4. गरुड़ पुराण-- 1.113.10 (सामान्य संदर्भ)
अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च।
भावार्थ:
अहिंसा परम धर्म है।
अर्थ: सभी प्राणियों के प्रति करुणा और अहिंसा — यही आर्यत्व है।
5. अग्नि पुराण (अध्याय 372 के आसपास)
सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
अर्थ: सबके कल्याण की भावना रखना।
6. नारद पुराण (पूर्व भाग)
धर्मः सर्वेषां भूतानां हितः।
भावार्थ:
सभी प्राणियों का हित ही धर्म है।
अर्थ: धर्म का उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व का कल्याण है।
निष्कर्ष--
पुराणों का सार स्पष्ट है—
परोपकार, अहिंसा, और सर्वहित ही सच्चा धर्म है।
मनुष्य को ऐसा जीवन जीना चाहिए जिससे समाज और विश्व का उत्थान हो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का पुराणों में व्यावहारिक रूप है—
दूसरों का भला करो और पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाओ।
गीता में प्रमाण--
1.(क) गीता-- 3.20 और 21
कर्मणैव हि संसिद्धिमास्थिता जनकादयः।
लोकसंग्रहमेवापि संपश्यन्कर्तुमर्हसि॥ (3.20)
यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः।
स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥ (3.21)
भावार्थ:
श्रेष्ठ पुरुष अपने आचरण से लोक का मार्गदर्शन करता है; इसलिए उसे लोकसंग्रह (विश्व के कल्याण) के लिए कर्म करना चाहिए।
अर्थ: स्वयं श्रेष्ठ बनकर पूरे समाज को श्रेष्ठ बनाना।
(ख). गीता-- 12.4
सर्वभूतहिते रताः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं।
अर्थ: सबके कल्याण में लगे रहना — यही “विश्व को आर्य बनाना” है।
(ग). गीता-- 5.25
लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणम् ऋषयः क्षीणकल्मषाः।
छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः॥
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगे रहते हैं, वे परम शांति को प्राप्त करते हैं।
अर्थ: सर्वहित ही श्रेष्ठता का मार्ग है।
(घ) गीता-- 6.29
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि।
ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शनः॥
भावार्थ:
योगी सभी प्राणियों में अपने आत्मा को और अपने में सभी को देखता है।
अर्थ: सबमें एकता का दर्शन — यही उच्च (आर्य) दृष्टि है।
(च). गीता-- 18.46
यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम्।
स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः॥
भावार्थ:
जिससे सबकी उत्पत्ति हुई है, उसी की अपने कर्मों से पूजा करके मनुष्य सिद्धि प्राप्त करता है।
अर्थ: अपने कर्तव्य से विश्व-व्यवस्था को श्रेष्ठ बनाना।
निष्कर्ष
गीता का स्पष्ट संदेश है—
लोकसंग्रह (विश्व कल्याण) के लिए कर्म करो, सर्वभूतहित में लगे रहो, अपने आचरण से दूसरों को प्रेरित करो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का गीता में व्यावहारिक रूप है—
स्वयं श्रेष्ठ बनो और पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाओ।
महाभारत में प्रमाण--
1(क) महाभारत, शान्ति पर्व-- 262.5
अहिंसा परमो धर्मः धर्म हिंसा तथैव च।
भावार्थ:
अहिंसा परम धर्म है।
अर्थ: सभी प्राणियों के प्रति करुणा और अहिंसा — यही विश्व को श्रेष्ठ बनाने का आधार है।
(ख). महाभारत, शान्ति पर्व --109.11
सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
अर्थ: सर्वहित की भावना ही आर्यत्व (श्रेष्ठता) है।
(ग). महाभारत, अनुशासन पर्व --113.8
आत्मनः प्रतिकूलानि परेषां न समाचरेत्।
भावार्थ:
जो व्यवहार अपने लिए प्रतिकूल है, वह दूसरों के साथ न करो।
अर्थ: नैतिक आचरण द्वारा समाज को श्रेष्ठ बनाना।
(घ). महाभारत, शान्ति पर्व-- 90.24
धर्मो रक्षति रक्षितः।
भावार्थ:
जो धर्म की रक्षा करता है, धर्म उसकी रक्षा करता है।
अर्थ: धर्म पालन से ही समाज और विश्व सुरक्षित व श्रेष्ठ बनता है।
(च)०. महाभारत, शान्ति पर्व 167.9
न हि ज्ञानेन सदृशं पवित्रमिह विद्यते।
भावार्थ:
ज्ञान के समान कोई पवित्र वस्तु नहीं है।
अर्थ: ज्ञान का प्रसार ही विश्व को श्रेष्ठ बनाता है।
(छ). महाभारत, वन पर्व --313.117
परोपकाराय सतां विभूतयः।
भावार्थ:
सज्जनों की सम्पत्ति परोपकार के लिए होती है।
अर्थ: दूसरों का भला करना ही सच्ची श्रेष्ठता है।
निष्कर्ष--
महाभारत का स्पष्ट संदेश है—
अहिंसा, परोपकार और धर्म का पालन करो
सर्वभूतहित में लगे रहो
ज्ञान और सदाचार का प्रसार करो
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का महाभारत में व्यावहारिक रूप है
स्वयं श्रेष्ठ बनकर समाज और विश्व को श्रेष्ठ बनाना।
1(क). मनुस्मृति-- 6.92
धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमक्रोधो दशकं धर्मलक्षणम्॥
भावार्थ:
धैर्य, क्षमा, इन्द्रियनिग्रह, सत्य आदि धर्म के दस लक्षण हैं।
अर्थ: इन गुणों को अपनाकर मनुष्य स्वयं तथा समाज को श्रेष्ठ बनाता है।
(ख). मनुस्मृति-- 10.63
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
एतं सामासिकं धर्मं चातुर्वर्ण्येऽब्रवीन्मनुः॥
भावार्थ:
अहिंसा, सत्य, चोरी न करना, शुद्धता और इन्द्रियनिग्रह — यह सबके लिए समान धर्म है।
अर्थ: सार्वभौमिक नैतिकता से सम्पूर्ण विश्व का उत्थान।
२- याज्ञवल्क्य स्मृति-- 1.122
अहिंसा सत्यमस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
दानं दमश्च यज्ञश्च स्वाध्यायस्तप आर्जवम्॥
भावार्थ:
अहिंसा, सत्य, दान, स्वाध्याय, तप आदि धर्म के अंग हैं।
अर्थ: इनका पालन समाज को श्रेष्ठ बनाता है।
3- याज्ञवल्क्य स्मृति 1.156 (सामान्य संदर्भ)
सर्वभूतहिते रतः।
भावार्थ:
जो सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
अर्थ: सर्वहित ही सच्चा धर्म है।
4-. पाराशर स्मृति-- 1.24 (सामान्य संदर्भ)
अहिंसा परमोधर्मः।
भावार्थ:
अहिंसा ही परम धर्म है।
अर्थ: करुणा और अहिंसा से ही विश्व श्रेष्ठ बनता है।
5-. नारद स्मृति (प्रारम्भिक अध्याय)
धर्मो हि सर्वभूतानां हितः।
भावार्थ:
सभी प्राणियों का हित ही धर्म है।
अर्थ: धर्म का उद्देश्य सम्पूर्ण विश्व का कल्याण है।
निष्कर्ष--
स्मृतियों का सार यही है—
अहिंसा, सत्य, दया, दान को अपनाओ।
सर्वभूतहित में लगे रहो।
ऐसा आचरण करो जिससे सम्पूर्ण समाज और विश्व का उत्थान हो।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का स्मृतियों में व्यावहारिक रूप है—
स्वयं श्रेष्ठ बनो और पूरे विश्व को श्रेष्ठ बनाइए।
नीति ग्रन्थों में प्रमाण--
1. हितोपदेश
“अयं निजः परो वेति गणना लघुचेतसाम्।
उदारचरितानां तु वसुधैव कुटुम्बकम्॥”
हितोपदेश, मित्रलाभ, श्लोक 71
अर्थ: उदार लोगों के लिए पूरी पृथ्वी परिवार है — यही “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” की भावना है।
2. पंचतंत्र--
“सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः।
सर्वे भद्राणि पश्यन्तु, मा कश्चिद् दुःखभाग्भवेत्॥”
भावार्थ --यह बृहदारण्यक उपनिषद् का प्रसिद्ध मंत्र है। इसमें सभी के लिए सुख और मंगल की कामना की गयी है।
3. चाणक्य नीति
“परोपकाराय फलन्ति वृक्षाः, परोपकाराय वहन्ति नद्यः।
परोपकाराय दुहन्ति गावः, परोपकारार्थमिदं शरीरम्॥”
चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 13
अर्थ: प्रकृति की हर वस्तु परोपकार के लिए है — मनुष्य भी ऐसा ही बने।
4. विदुर नीति (महाभारत से)
“सर्वभूतहिते रतः”
महाभारत, उद्योग पर्व, अध्याय 33 (विदुर नीति)
जो सब प्राणियों के हित में लगा रहता है वही श्रेष्ठ है।
5. चाणक्य नीति
“त्यजेदेकं कुलस्यार्थे ग्रामस्यार्थे कुलं त्यजेत्।
ग्रामं जनपदस्यार्थे आत्मार्थे पृथिवीं त्यजेत्॥”
चाणक्य नीति, अध्याय 1, श्लोक 17
यह श्लोक बताता है कि बड़े हित (समष्टि) को प्राथमिकता देना चाहिए — जो “विश्व हित” की ओर संकेत है।
निष्कर्ष-
इन सभी नीति ग्रन्थों यह स्पष्ट करते हैं कि परोपकार, विश्व-कल्याण, समस्त मानवता को एक परिवार मानना।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (ऋग्वेद) का वास्तविक अर्थ और उद्देश्य है।:
1. वाल्मीकि रामायण में प्रमाण--
(1)
“सर्वभूतहिते रतः”
स्थान: अयोध्याकाण्ड- 2.1.31 (कुछ संस्करणों में भिन्नता)
श्रीराम के गुण बताते हुए कहा गया है कि वे सभी प्राणियों के हित में लगे रहते थे।
यह “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” का प्रत्यक्ष रूप है।
(2)“जननी जन्मभूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी”
स्थान: युद्धकाण्ड --6.124.17 (लोकप्रिय पाठ)
अर्थ:
माता और जन्मभूमि स्वर्ग से भी महान हैं।
यहाँ अपने कर्तव्य और धर्म पालन से समाज को श्रेष्ठ बनाने का संदेश है।
2. गर्ग संहिता में प्रमाण--
(1)
“लोकानां हितकारिणौ”
स्थान: गर्ग संहिता, गोलोक खण्ड (अध्याय भिन्न संस्करणों में बदलता है)
श्रीकृष्ण और बलराम को
संपूर्ण लोकों के हित करने वाले कहा गया है।
(2)“भवाय सर्वभूतानाम्”
संदर्भ: विभिन्न अध्यायों में भगवान के अवतार का उद्देश्य
अर्थ:
“सभी प्राणियों के कल्याण के लिए”
यह स्पष्ट करता है कि दिव्य कार्य का उद्देश्य विश्व का कल्याण और उत्थान है।
3- योग वशिष्ठ में प्रमाण-
(1) “सर्वभूतहिते रतः”
स्थान: योग वशिष्ठ, वैराग्य प्रकरण (अध्याय भिन्न)
ज्ञानी पुरुष का लक्षण बताया गया है कि वह सभी प्राणियों के हित में लगा रहता है।
(2)“यथा सर्वाणि भूतानि आत्मन्येव पश्यति”
स्थान: योग वशिष्ठ, उपशम प्रकरण
अर्थ:
जब मनुष्य सभी प्राणियों को अपने समान देखता है—
तब वह किसी का अहित नहीं करता और विश्व को श्रेष्ठ बनाने की दिशा में कार्य करता है।
क़ुरआन और हदीस में प्रमाण--
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” (संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ / सबका उत्थान करो) का जो भाव है—सर्वजन हित, नैतिकता और मानवता—वह इस्लामिक धर्मग्रन्थों में भी स्पष्ट रूप से मिलता है। नीचे क़ुरआन और हदीस से प्रमाण दिए जा रहे हैं:
1. क़ुरआन से प्रमाण
(क)
“इन्नल्लाह यअमुरु बिल-अद्लि वल-इह्सान…”
(إِنَّ اللَّهَ يَأْمُرُ بِالْعَدْلِ وَالإِحْسَانِ)
सूरह अन-नहल (16:90)
अर्थ:
अल्लाह आदेश देता है न्याय (अद्ल) और भलाई (एहसान) का।
यह समाज को श्रेष्ठ बनाने का मूल सिद्धांत है।
(2)
“मन क़तल नफ़्सन… फका-अन्नमा क़तलन्नास जमीयन,
व मन अह्याहा फका-अन्नमा अह्यन्नास जमीयन”
सूरह अल-माइदा (5:32)
अर्थ:
जिसने एक निर्दोष व्यक्ति की हत्या की, उसने मानो पूरी मानवता को मारा;
और जिसने एक को बचाया, उसने पूरी मानवता को बचाया।
यह विश्व-कल्याण और मानवता की रक्षा का सर्वोच्च भाव है।
(3)
“व मा अरसल्नाक इल्ला रहमतन लिल-आलमीन”
सूरह अल-अंबिया (21:107)
अर्थ:
(हे मुहम्मद) हमने आपको सारे संसार के लिए दया (रहमत) बनाकर भेजा।
यहाँ सम्पूर्ण विश्व के कल्याण की बात है।
(4)
“ला इकराह फिद्दीन”
सूरह अल-बक़रा (2:256)
अर्थ:
धर्म में कोई जबरदस्ती नहीं है।
यह सहिष्णुता और नैतिक श्रेष्ठता का सिद्धांत है।
2. हदीस से प्रमाण--
(सहीह बुखारी, सहीह मुस्लिम)
(1)
“खैरुन्नास मन यनफ़अुन्नास”
(मुस्नद अहमद / अन्य संग्रहों में)
अर्थ:
सबसे अच्छा इंसान वह है जो दूसरों के लिए सबसे अधिक लाभदायक हो।
यह “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” का सीधा रूप है।
(2)
“ला युमिनु अहदुकुम हत्ता युहिब्ब लि-अखीहि मा युहिब्बु लिनफ़्सिहि”
सहीह बुखारी 13 / सहीह मुस्लिम 45
अर्थ:
तुम में से कोई सच्चा ईमान वाला नहीं हो सकता जब तक वह अपने भाई के लिए वही पसंद न करे जो अपने लिए करता है।
यह सर्वहित और समानता की भावना है।
निष्कर्ष
इस्लामिक ग्रन्थों में भी वही मूल भावना मिलती है जो
“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” में है:
न्याय और भलाई (अद्ल, इ
जहसान)
संपूर्ण मानवता की रक्षा
विश्व के लिए दया (रहमत)
दूसरों के लिए उपयोगी बनना
अर्थात् —
सिर्फ अपने लिए नहीं, बल्कि पूरे विश्व के उत्थान और कल्याण के लिए कार्य करना।
सिक्ख ग्रन्थों में प्रमाण--
गुरु ग्रन्थ साहिब से प्रमाण--
(1)
“ਸਰਬੱਤ ਦਾ ਭਲਾ” (सरबत दा भला)
अर्थ/स्रोत:
यह पंक्ति सिख अरदास का मुख्य भाग है (गुरु परम्परा से)
अर्थ:
सभी का भला हो, सबका कल्याण हो।
यह सीधे “विश्व को श्रेष्ठ बनाओ” का भाव है।
(2)
“ਨ ਕੋ ਬੈਰੀ ਨਹੀ ਬਿਗਾਨਾ, ਸਗਲ ਸੰਗ ਹਮ ਕਉ ਬਨਿ ਆਈ”
गुरु ग्रन्थ साहेब- 1299
अर्थ:
न कोई मेरा शत्रु है, न कोई पराया;
मैं सबके साथ प्रेमपूर्वक रहता हूँ।
यह विश्व-बंधुत्व और श्रेष्ठ आचरण का संदेश है।
(3)
“ਸਭਨਾ ਜੀਆ ਕਾ ਇਕੁ ਦਾਤਾ, ਸੋ ਮੈ ਵਿਸਰਿ ਨ ਜਾਈ”
गुरु ग्रन्थ साहेब- 425
अर्थ:
सभी जीवों का दाता एक ही परमात्मा है।
इससे सभी में एकता और समानता का भाव आता है।
दशम ग्रन्थ में प्रमाण--
(1)
“ਮਾਨਸ ਕੀ ਜਾਤ ਸਭੈ ਏਕੈ ਪਹਿਚਾਨਬੋ”
(गुरु गोबिन्द सिंह)
स्रोत: दशम ग्रंथ
अर्थ:
पूरी मानव जाति को एक ही समझो।
यह सम्पूर्ण मानवता को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा देता है।
(2)
“ਜਿਨ ਪ੍ਰੇਮ ਕੀਓ ਤਿਨ ਹੀ ਪ੍ਰਭੁ ਪਾਇਓ”
(गुरु गोबिन्द सिंह)
स्रोत: दशम ग्रंथ
अर्थ:
जिसने प्रेम किया, उसी ने परमात्मा को पाया।
प्रेम और करुणा से ही विश्व का उत्थान संभव है।
निष्कर्ष--
सिक्ख धर्म का मूल संदेश ही है:
सरबत दा भला → सबका कल्याण
कोई पराया नहीं → विश्व-बंधुत्व
सबमें एक ही परमात्मा → समानता
प्रेम और सेवा → श्रेष्ठ समाज का निर्माण
इसलिए सिक्ख धर्म भी पूरी तरह से“कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” के भाव को पुष्ट करता है—
“सभी का भला करो, सभी को श्रेष्ठ बनाओ।”
ईसाई धर्म में प्रमाण--
1. बाइबल से प्रमाण
(1)
“Love your neighbour as yourself.”
(अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो)
मत्ती- 22:39 (Matthew 22:39)
यह सार्वभौमिक प्रेम और मानवता का मूल सिद्धांत है।
(2)
“Blessed are the peacemakers: for they shall be called the children of God.”
मत्ती- 5:9 (Matthew 5:9)
अर्थ:
धन्य हैं वे जो शांति स्थापित करते हैं।
यह समाज और विश्व को श्रेष्ठ बनाने की प्रेरणा है।
(3)
“Do to others as you would have them do to you.”
लूका- 6:31 (Luke 6:31)
अर्थ:
दूसरों के साथ वैसा ही व्यवहार करो जैसा तुम अपने लिए चाहते हो।
यह नैतिक श्रेष्ठता और समानता का सिद्धांत है।
(4)
“Love your enemies and pray for those who persecute you.”
मत्ती 5:44 (Matthew 5:44)
अर्थ:
अपने शत्रुओं से भी प्रेम करो और जो तुम्हें सताते हैं उनके लिए प्रार्थना करो।
यह उच्चतम स्तर की करुणा और श्रेष्ठता दर्शाता है।
(5)
“Let your light shine before others, that they may see your good deeds.”
मत्ती 5:16 (Matthew 5:16)
अर्थ:
अपने अच्छे कर्मों से दूसरों के सामने प्रकाश फैलाओ।
यह पूरे समाज को प्रेरित कर श्रेष्ठ बनाने का संदेश है।
(6)
“Go into all the world and preach the gospel to all creation.”
मरकुस 16:15 (Mark 16:15)
अर्थ:
पूरे संसार में जाओ और शुभ संदेश फैलाओ।
यह विश्व-स्तर पर नैतिकता और धर्म का प्रसार है।
निष्कर्ष-
ईसाई धर्मग्रन्थों में भी वही मूल भाव मिलता है:
सबसे प्रेम करो (Universal Love)
शांति स्थापित करो (Peace)
समानता और नैतिकता (Golden Rule)
अच्छे कर्मों से समाज को प्रेरित करो
अर्थात् —
पूरा विश्व नैतिक, प्रेमपूर्ण और श्रेष्ठ बने।
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का सार्वभौमिक रूप है।
जैन धर्म में प्रमाण--
1. तत्त्वार्थ सूत्र
(1)
“परस्परोपग्रहो जीवानाम्”
अध्याय 5, सूत्र 21
अर्थ:
“सभी जीव एक-दूसरे के उपकार (सहयोग) के लिए हैं।”
वो यह स्पष्ट रूप से बताता है कि
सभी का हित करना ही धर्म है — यही “विश्व को श्रेष्ठ बनाना” है।
2. आचारांग सूत्र
“सव्वे पाणा न हन्तव्वा”
प्रथम श्रुतस्कंध, अध्याय 4 (भावार्थ)
अर्थ:
“सभी प्राणियों की हिंसा नहीं करनी चाहिए।”
अहिंसा के माध्यम से ही विश्व का कल्याण संभव है।
3. उत्तराध्ययन सूत्र
(3)
“खम्मामि सव्व जीवे, सव्वे जीवा खमंतु मे।
मित्ति मे सव्व भूएसु, वेरं मज्झ न केणइ॥”
अध्याय 4, श्लोक 62
अर्थ:
मैं सभी जीवों से क्षमा चाहता हूँ, सभी मुझे क्षमा करें;
मेरा सभी से मित्रभाव है, किसी से वैर नहीं।
यह विश्व-बंधुत्व और शुद्ध आचरण का सर्वोच्च आदर्श है।
4. दशवैकालिक सूत्र
(4)
“अहिंसा परमॊ धर्मः” (भावार्थ रूप में जैन परम्परा में अत्यंत प्रसिद्ध)
संदर्भ: दशवैकालिक सूत्र (भावार्थ आधारित परम्परा)
अर्थ:
अहिंसा ही सर्वोच्च धर्म है।
अहिंसा से ही सभी जीवों का कल्याण और श्रेष्ठता संभव है।
5. महावीर स्वामी के उपदेश
(5)
“जीओ और जीने दो” (परम्परागत उपदेश)
अर्थ:
स्वयं भी जीओ और दूसरों को भी जीने दो।
यह सम्पूर्ण विश्व के प्रति करुणा और सह-अस्तित्व का सिद्धांत है।
निष्कर्ष--
जैन धर्म का मूल ही है:
अहिंसा (Non-violence)
सर्वजीव कल्याण (Universal welfare)
मित्रभाव और क्षमा (Friendship & Forgiveness)
परस्पर सहयोग (Mutual support)
इसलिए जैन धर्म भी पूरी तरह से यह सिखाता है कि—
“संपूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ, सबका भला करो”
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का मूल रूप है।
बौद्ध धर्म में प्रमाण--
त्रिपिटक से प्रमाण-- पिटक–ग्रन्थ–श्लोक/सूत्र संख्या सहित दिए जा रहे हैं:
1. सुत्त पिटक – करणीय मेत्ता सुत्त
(1)
“सुखिनो वा खेमिनो होंतु, सब्बे सत्ताः”
सुत्त निपात-- 1.8 (Karaniya Metta Sutta)
अर्थ:
“सभी प्राणी सुखी और सुरक्षित हों।”
यह सार्वभौमिक कल्याण (Universal welfare) का सीधा संदेश है।
(2)
“माता यथा निअं पुत्रं आयुसा एकपुत्तमनुरक्खे…”
सुत्त निपात-- 1.8
अर्थ:
जैसे माता अपने इकलौते पुत्र की रक्षा करती है,
वैसे ही सभी प्राणियों के प्रति प्रेम रखो।
यह सर्वोच्च करुणा और विश्व-हित का आदर्श है।
2. धम्मपद
(3)
“सब्बपापस्स अकरणं, कुसलस्स उपसम्पदा;
सचित्तपरियोदपनं — एतं बुद्धानं सासनं॥”
धम्मपद, श्लोक 183
अर्थ:
पाप न करना, पुण्य करना और मन को शुद्ध रखना—
यही बुद्ध का उपदेश है।
यह मनुष्य को श्रेष्ठ बनाकर समाज को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग है।
(4)
“न हि वेरेन वेरानि सम्मन्ति ध कुदाचनं;
अवेरेन च सम्मन्ति…”
धम्मपद, श्लोक 5
अर्थ:
द्वेष से द्वेष कभी समाप्त नहीं होता,
केवल प्रेम (अद्वेष) से ही समाप्त होता है।
यह विश्व-शांति और श्रेष्ठता का मूल सिद्धांत है।
3. अंगुत्तर निकाय
(5)
“बहुजन हिताय, बहुजन सुखाय”
अंगुत्तर निकाय (AN 4.95 आदि संदर्भ)
अर्थ:
“अनेक लोगों के हित और सुख के लिए”
बुद्ध के उपदेशों का उद्देश्य ही
संपूर्ण समाज और विश्व का कल्याण है।
4. गौतम बुद्ध के उपदेश
(6)
“मेत्ता (मैत्री), करुणा, मुदिता, उपेक्षा” (चार ब्रह्मविहार)
अर्थ:
सभी प्राणियों के प्रति
प्रेम (मैत्री),दया (करुणा)
आनंद (मुदिता) समभाव (उपेक्षा)
यह विश्व को श्रेष्ठ बनाने का मानसिक और आध्यात्मिक आधार है।
निष्कर्ष
बौद्ध धर्म का मूल संदेश है:
सब प्राणी सुखी हों (Metta)
करुणा और प्रेम से द्वेष समाप्त करो
बहुजन हित और सुख के लिए कार्य करो
स्वयं को सुधारो, विश्व सुधरेगा
अर्थात् —संपूर्ण विश्व का उत्थान और कल्याण
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का मूल रूप है।
(यहूदी धर्मग्रन्थ,तनाख) में प्रमाण--
1. तनाख से प्रमाण
(1)
“Love your neighbor as yourself.”
लैव्यव्यवस्था 19:18 (Leviticus 19:18)
अर्थ:
अपने पड़ोसी से वैसे ही प्रेम करो जैसे अपने आप से करते हो।
यह सार्वभौमिक प्रेम और नैतिक श्रेष्ठता का मूल सिद्धांत है।
(2)
“Seek peace and pursue it.”
भजन संहिता 34:14 (Psalms 34:14)
अर्थ:
शांति की खोज करो और उसका अनुसरण करो।
यह समाज और विश्व में शांति स्थापित करने का संदेश है।
(3)
“What does the Lord require of you? To act justly, love mercy, and walk humbly with your God.”
मीका 6:8 (Micah 6:8)
अर्थ:
ईश्वर तुमसे क्या चाहता है? — न्याय करो, दया से प्रेम करो, और विनम्रता से चलो।
यह नैतिक जीवन द्वारा विश्व को श्रेष्ठ बनाने का मार्ग है।
(4)
“Justice, justice shall you pursue.”
व्यवस्थाविवरण 16:20 (Deuteronomy 16:20)
अर्थ:
न्याय का ही अनुसरण करो।
यह समाज को धर्मपूर्ण और श्रेष्ठ बनाने का आधार है।
(5)
“He has told you, O man, what is good…”
मीका 6:8 (Micah 6:8) (ऊपर का ही विस्तृत भाग)
यह बताता है कि अच्छा जीवन जीकर समाज का उत्थान करना ही धर्म है।
2. यहूदी परम्परा (Talmud)
(6)
“What is hateful to you, do not do to your fellow.”
(जो तुम्हें अपने लिए बुरा लगे, वह दूसरों के साथ मत करो)
तलमूद – Shabbat 31a
यह प्रसिद्ध उपदेश हिलेल का है।
यह “Golden Rule” का नकारात्मक रूप है,
जो सार्वभौमिक नैतिकता सिखाता है।
निष्कर्ष--
यहूदी धर्म में मुख्य सिद्धांत हैं:
पड़ोसी से प्रेम (Love)
न्याय और धर्म (Justice)
दया और विनम्रता (Mercy & Humility)
शांति का अनुसरण (Peace)
अर्थात् —
समाज और विश्व को नैतिक, न्यायपूर्ण और श्रेष्ठ बनाना
यही “कृण्वन्तो विश्वमार्यम्” का मूल रूप है।
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