स्वार्थ का गणित
दूध और जल में गिरे जो मक्खी, जग उसे फिंकवाता है,
शुद्धता के झूठे पाखंड में, अपना धर्म दिखाता है।
पर वही मक्खी गिरे घी में, तो मक्खी हाथ से गिरती है,
स्वार्थ के आगे जग की सारी, शुचिता फिर से फिरती है।
सस्ती वस्तु धूल में हो तो, कोई हाथ न लाता है,
कीचड़ है और गंदगी है—कह, मुँह फेर निकल जाता है।
पर कंचन यदि दिखे मल में, या लाश पर ही पड़ा हो,
तो उठाने को अधर्मी हाथ, सबसे पहले खड़ा हो।
कीमत यहाँ पदार्थ की है, पावनता की बात नहीं,
इंसानियत और संवेदना की, अब कोई औकात नहीं।
देख जगत की ये चतुराई, आशीष सत्य पहचान गया,
दाम बड़ा या इंसान बड़ा? ये द्वंद्व हृदय में ठान गया।
करुणा बिन जो ज्ञान मिला, वो केवल मन का भारीपन,
स्वार्थ के इस महाजाल में, खोया सबका अपनापन।
Adv. Ashish jain
7055301422