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॥ अकेले योद्धा का संकल्प ॥ एक ही संभालता संस्कार को, एक ही बचाया करता धर्म को। बाकी सब तो मोह की नींद में, गहरी चादर तान सोया करते। जब-जब उठीं उंगलियाँ रक्षक की नीयत पर, जब-जब लगे लांछन पवित्र सी सीरत पर। दुनिया की भीड़ बस शोर मचाया करती है, बस उसके बारे में यही सब कहा करते। कहते— "कब्जा लिया मंदिर है क्या?" कैसी विडंबना, कैसा ये झमेला है। जो बचा रहा है नींव को ढहने से हर पल, वो अपनी ही दुनिया में आज कतई अकेला है। क्या भूल है उसकी जो बचा रहा हर धूल है? जो कांटों के बीच खिला रहा आस्था का फूल है। पर समाज तो बस तमाशा देखने का शौकीन है, उसे रक्षक की मेहनत भी लगती कतई फिजूल है। वो मंदिर को ईंट नहीं, सम्मान मानता है, वो हर गिरते पत्थर का दर्द पहचानता है। बाकी सब तो बस अपनी ढपली बजाया करते, पर वो अकेला ही धर्म की लाज बचाना जानता है।
शीर्षक: "श्रमण चर्या का बदलता चोला" ब्रह्म मुहूर्त में जो उठकर, आत्म-ध्यान में लीन थे, जैन आगम के वे साधक, संयम में प्रवीण थे। पर आज देख कर ये दृश्य, मन भारी हो जाता है, जब साधु वेश में कोई, सुबह नाश्ता चबाता है। कहाँ गई वह 'नवकारसी', कहाँ गया वह त्याग? चाय की चुस्की में अब, जाग रहा अनुराग। दोपहर की गोचरी तो बस, एक रस्म बन गई है, साधु की वो तप-तपस्या, अब तो कहीं खो गई है। सूरज कहता - "सावधान! अब विदा मुझे तुम होने दो", चौ विहार का समय हुआ, अब जठराग्नि को सोने दो। मगर शाम के पाँच बजे भी, जो भोजन की आस रखे, वो क्या खाक मुमुक्षु होगा, जो जीभ पर ना लगाम रखे। चामुंडराय ने क्या सोचा था, क्या ऐसे होंगे निर्ग्रंथ? क्या भोग-विलास की राह चलेगा, ये पावन जैन पंथ? श्वेत वस्त्र तो धारण किए, पर मन में भारी लालसा है, ये श्रमण धर्म है या बस, सुविधानुसार एक तमाशा है? तप की अग्नि ठंडी पड़ी, इंद्रियों का जोर बढ़ा, साधुता की बलि चढ़ाकर, स्वाद का चस्का खूब बढ़ा। आशीष! देख ये विडंबना, रक्षक ही भक्षक बनता है, शास्त्रों का शासन रोता है, जब संयम रोज मरता है। Adv.आशीष जैन 7055301422
लाइफ की करप्ट विंडो मेरे मदरबोर्ड (ईश्वर) ने जब, ये पुर्जा नया बनाया, ठोक-बजाकर हार्ड डिस्क (आत्मा) का, एक पीस लगाया। सन् दो हजार छह की वो, 'विंडो एक्स पी' वाली रात थी, नया सिस्टम, नया जोश, और खुशियों की शुरुआत थी। सीडी-रोम (मम्मी-पापा) ने इसमें, संस्कार का सॉफ्टवेयर भरा, एंटीवायरस बनकर गुरु आए, ताकि सिस्टम रहे खरा। पर हाय रे किस्मत! कुछ गलत दोस्तों के 'वायरस' आ गए, कुछ गर्लफ्रेंड के 'मैलवेयर', मेरा सारा रैम (RAM) खा गए। इंटरनेट से फाइल अटैच हुई, जिसे शादी कहते हैं, अपडेट हुआ एंटीवायरस (नौकरी), अब हम ऑफिस में रहते हैं। कॉपी-पेस्ट के चक्कर में, एक नई फाइल (बच्चा) डाउनलोड हुई, खुशियाँ तो बहुत मिलीं, पर मेमोरी थोड़ी ओवरलोड हुई। अब महँगाई की डायन ने, फाइलें ऐसी करप्ट कीं, सिस्टम होने लगा हैंग, और विंडो ही इरप्ट (Erupt) की। अब दुनिया जब भी पूछती है— "आशीष भाई, क्या हाल है?" तो मेरा सॉफ्टवेयर बस एक ही, एरर कोड (Error Code) उगलता है: "माफ़ करना भाई, 'योर पासवर्ड इज़ इनकरेक्ट',मेरा दिल अब हैग है, और दिमाग डिसकनेक्ट!"
शीर्षक: बेलन और ब्रह्मांड का युद्ध सुबह सवेरे गरम चाय की, माँग जो मैंने कर दी, पत्नी ने गुस्से की ज्वाला, आँखों में अपनी भर दी। बोली— "चाय चाहिए या फिर, अपना सिर फुड़वाना है? आज सफाई का दिन है, या फिर बहाना बनाना है?" लड़ाई ऐसी छिड़ गई जैसे, सरहद पर घमासान हो, वो थी सुलगती झाँसी की रानी, मैं डरा हुआ इंसान हो। मैंने कहा— "ओ प्रिये! ज़रा तो, रहम इस दिल पर खाओ," वो बोली— "चाय छोड़ो, पहले ये मकड़ी का जाला हटाओ!" वो उठी तो लगा कि कोई, भारी तूफ़ान आएगा, बेलन हाथ में देख लगा, मेरा भूगोल बदल जाएगा। मैंने आवाज़ उठाई तो वो, 'सुनामी' बनकर आई, एक घंटे तक फिर घर में, मेरी 'सर्जिकल स्ट्राइक' हुई। मैदान-ए-जंग में खड़ा मैं, बस आहें भरता रहा, अपनी ही शादी के फैसले पर, मन ही मन मरता रहा। आशीष! अब हालत ऐसी है कि, कोना ढूँढ के बैठा हूँ, शेर था कल तक घर का, आज भीगी बिल्ली बना बैठा हूँ। अब वो उस कमरे में बैठी, 'मौन व्रत' का तीर चलाती है, मैं इस कमरे में बैठा, जैसे सज़ा-ए-मौत काटता हूँ। दोस्ती करने जाऊं तो, वो 'नागपाश' सी डसती है, और मेरी इस हालत पर, मोहल्ले की कामवाली हँसती है! Adv. आशीष जैन 7055301422
कविता: दरिया का फासला नदी के उस किनारे पर, वो बनकर आस बैठी है, दबाकर दिल में अरमानों की, मीठी प्यास बैठी है। इधर हम हैं कि सूनी रेत पर, चुपचाप बैठे हैं, लगाकर ज़ख्म लहरों का, कोई इतिहास बैठे हैं। हमारी कश्ती तो उस पार, जाने से ही रूठ गई,मझधार में ही किस्मत की, वो डोरी टूट गई।जो लेकर जाती उस साहिल पे, वो कश्ती ही डूब चुकी,मिलन की हर हसीं ख़्वाहिश, दरिया में ही ऊब चुकी। न आवाज़ वहाँ पहुँचे, न कोई राह दिखती है, तड़प ये फासले वाली, न कागज़ पर लिखी जाती है। वो सुध-बुध खोके बैठी है, हम आहें भरके बैठे हैं, दबे अरमान सीने में, कई पत्थर से बैठे हैं। कैसे हो बात अब उनसे, कि दरिया बीच में गहरा,लगा है बेबसी का आज, यादों पर कड़ा पहरा।वो बस एक अक्स जैसी है, जो लहरों पर चमकती है,मगर छूने को बढ़ते हैं, तो ये दुनिया धमकती है। नदी बहती ही जाती है, जुदाई को जताने को, कोई 'आशीष' तो दे दे, इस टूटे आशियाने को। वो उस तट पर, हम इस तट पर, बस निहारा करते हैं, बिना पतवार के हम, उम्र सारा गुजारा करते हैं। Adv.आशीष जैन 7055301422
गज़ल: आँखों की ज़ुबान हृदय में प्रेम जागा था... मगर इज़हार से डरते, तुम्हें भी प्यार था हमसे... मगर इकरार से डरते। अजब ये कशमकश थी... हम बस आँखों से बात करते रहे, ठंडी आहें भरते रहे... मिलने का इंतज़ार करते रहे। कभी हम चुप रहे... कभी तुम चुप रहे, ख़ामोशी बोलती रही, नज़र से दिल की जो बातें थीं... वो हर पल होती रहीं। मगर जब बात लबों तक आई... तो हम संसार से डरते, तुम्हें भी प्यार था हमसे... मगर इज़हार से डरते। अजब सी प्यास थी आँखों में... अजब सा एक साया था, कि जैसे रूह ने मेरी... तुम्हें अपना बनाया था। मगर खोने के डर से हम... खुद अपनी पुकार से डरते, हृदय में प्रेम जागा था... मगर इकरार से डरते। तड़प दिल की ये 'आशीष'... आँखों ही आँखों में पलती रही, मोहब्बत की ये शमा... बस धड़कनों में जलती रही। ग़ज़ल बन कर जो छलका दर्द... तो हम झंकार से डरते, हृदय में प्रेम जागा था... मगर इज़हार से डरते। adv.आशीष जैन 7055301422
कोंकणी: सगांलो इष्ट (सबकी दोस्त) कोंकणच्या दर्या देगेर, गाजता आमची कोंकणी मायेची, उतरां ताचीं शेंकड्यां वरसां, गोडसाण जशें आसा साकरेची। ना कोणाकडेन झगडीं, ना कोणाकडेन कसलेंच वैर, सगळ्यां भासां कडेन तिचें नातें, जशें काळजांतलें सैर। आशीष म्हणटा, ही भास आसा सगळ्यांची मोगाची लाडकी, कानडी आसूं वा हेर कोण, उघडी दवरता आपली घरकी। मेळोवन घेता सगळ्यांक, न्हय कोणाचो तिरस्कार, आमची कोंकणी आसा, साऱ्या जगाचो सत्कार! adv. आशीष जैन 7055301422
तुजी याद आयली, (तेरी याद आई,) आनी मोजे काळीज रडलें, (और मेरा दिल रो पड़ा,) तुवें म्हाकाच इबाडलें, (तुमने मुझे ही बर्बाद कर दिया,) मोज्या मोगान तुका न्हाययलें, (मेरे प्यार ने तुम्हें नहलाया था,) पुण तुवें मोज्या जिविताचो उजो केलो। (पर तुमने मेरी जिंदगी की आग लगा दी।) कोंकणी भास मोज्या रगतांत आसा, (कोंकणी भाषा मेरे खून में है,) ती अमृता सारकी गोड आसा, (वह अमृत जैसी मीठी है,) मराठी परस चड तिखट आनी सुंदर, (मराठी से कहीं ज्यादा तीखी और सुंदर,) मोज्या गोयांची हीच तर खरी वळख आसा। (मेरे गोवा की यही तो असली पहचान है।)
कलम का स्वाभिमान दंभ के महलों में बैठकर, वो खुद को खुदा समझते हैं, मातृभाषा की आड़ में, वो हिंदी को 'गदा' समझते हैं। नफरत की इस राजनीति ने, साहित्य का आँगन मैला किया, जोड़ने वाली विधा को, भाषाई जंग का अखाड़ा किया। वो समझते हैं हम भिखारी हैं, शब्दों की भीख मांगते हैं, शायद भूल गए वो 'दिनकर' को, जो सोए शेर जगाते हैं। हमारी खामोशी को हमारी, मजबूरी मान बैठे वो, हिंदी के विशाल सागर को, एक छोटी क्यारी मान बैठे वो। तुम करो नौटंकी अपनी, हम अपनी साख बचाएंगे, तुम नफरत की भाषा लिखो, हम प्रेम का राग सुनाएंगे। इतिहास गवाह है वक्त का, हर घमंड एक दिन टूटता है, कलम जब सच लिखती है, तो सिंहासन भी छूटता है। भिखारी वो नहीं जिसके पास 'व्यूज' की कमी है, भिखारी वो है जिसकी सोच में, संस्कारों की कमी है। रचना की उम्र लंबी है, ये शोर तो बस दो दिन का है, साहित्य वही अमर हुआ, जो हर भाषा में जन-जन का है। adv. आशीष जैन 7055301422
मुखौटों का शहर पॉश गली की कोठियों में, ऊँचे-ऊँचे द्वार थे, बाहर दरिंदे घूम रहे, भीतर सब 'संस्कार' थे। चीख गूँजी रात में, पर बंद खिड़की-कान थे, इंसानियत चुप थी खड़ी, पत्थर हुए इंसान थे। कोई न आया बचाने को, बस एक बेजुबान लड़ा, हौसला उस जीव का, उन कायरों से था बड़ा। नोचते थे वे बदन, वह क्रोध में चिल्ला रहा, चीख को सुन-सुन के वह, बस रोना अपना पा रहा। भौर होते ही अचानक, जाग उठीं संवेदनाएं, हाथ में कैंडल लिए, अब दे रहे सब दुआएं। कैमरों के सामने, कुछ अश्क भी छलका दिए, पाप जो कल रात थे, वे मोम से झलका दिए। वही गवाह 'अशुभ' है, जो सत्य पर है भौंकता, पाखंड की इस भीड़ को, जो आईना है सौंपता। 'मनहूस' कहकर उस वफ़ा को, दूर सबने कर दिया, झूठ की चादर तले, फिर सच को उसने भर दिया। धिक्कार है उस सभ्यता पर, जहाँ रक्षक मौन है, खुद से पूछो ऐ मनुज, अब जानवर यहाँ कौन है? मोमबत्ती मत जलाओ, गर लहू ठंडा पड़ा, इंसान से तो आज वह, 'मनहूस' कुत्ता ही बड़ा। Adv. आशीष जैन 705301425
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