दादी,
आपके बिना ये घर–घर नहीं लगता
आज आँगन सूना लगता है,
आपकी हँसी बिना सब अधूरा लगता है।
हर दिन अब कुछ ज़्यादा ही भारी लगता है।
आपके बिना जीना भी अब थोड़ा मुश्किल लगता है।
आपके साथ वो आंगन में बैठना अब भी याद है मुझे
अब आप नहीं तो ये आँगन भी आज पराया लगता है।
और सच कहूं तो
दादी,
आपके बिना ये घर–घर नहीं लगता
- Nirbhay Shukla