उनसे नजरे चुरा कर भागते हुए लेक्चर हल में बैठ तो गई थी,
लेकिन अपने लाल लाल गाल कहा छिपा प रही थी,
अचानक किसी ने कंधे पर हाथ रखा,
सामने उन्हें ही पाया जब पलट कर देखा,
उन्होंने कहा: क्या अब मुझे देखना भी चाहती ?
मना करते हुए शर्म से लाल मैं... पलटी और पानी का बॉटल उठाने लगी और तभी, कुछ यू हुआ कि वो भी झुके,
नजरों से नजर जा मिली,
दोनों से एक शब्द भी कही ना गई,
वापिस चेयर में बैठते हुए लेकिन हमारे हाथ से उनके हाथ टकरा ज़रूर गई,
वो महज एक छुअन नहीं एक एहसास था,
एहसास था बेहद प्यार का,
एहसास था इजहार के बाद दूसरी मुलाकात का !