ग़ज़ल: दर्द की शाखों पर ख्वाब खिले
साँसों की सरगम में साज़ नहीं,
तेरी यादों का भी राज़ नहीं।
तू भी खोया है उन गलियों में,
जहाँ अब कोई आवाज़ नहीं।
चाँद भी तन्हा रोता होगा,
तारों में तेरा अंदाज़ नहीं।
दिल के वीराने में राख पड़ी,
अब जलने की कोई आग़ नहीं।
तेरी हँसी का मौसम बीता,
अब आँखों में वो बाज़ नहीं।
चलो मोहब्बत को छोड़ आएँ,
जहाँ जज़्बातों का बाज़ार नहीं।
लेखक
सुहेल अंसारी (सनम)
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