सोच रहा हूँ उठा लूं कलम,
और उनपे वार करुं।
गुज़र रहा हूँ किस ग़म से,
ये किसको बयां करूं।
दस्तक दी है चौखट पे,
अंदर से कुछ तो बोलो,
दरवाज़ा ना सही,
ज़रा सी खिड़की तो खोलो,
देखो तो ज़रा,
बाहर एक मुहब्बत का,
कर्ज़दार आया है।
मायूस होकर वापस चला जाऊं,
या कुछ देर और इंतज़ार करूं।
~अज़ीम ख़ान