कुछ कहना था,
पर चुप ही रहती हूँ।
कुछ दबी सी ख्वाहिशें,
दबी ही रहने देती हूँ।
कुछ कमीयाँ हैं मुझमें,
उन्हें कमी ही रहने देती हूँ।
कुछ बेताबी हैं आज फिर कही इस दिल में,
आज भी इस बेताबी को सबर ही रहने देती हूँ।
मैं आज सब जानकर भी खुश हूँ,
सब न जानकर भी,
चलो आज भी मैं अपनी जरुरतें ही पूरी करलूँ,
ख्वाहिशें अधूरी ही रहने देती हूँ।
मैं औरों की तरह न बन सकी न बन पाऊँगी कभी,
चलो मैं खुदको आज मैं ही रहने देती हूँ।