एक एहसास
ना जाने कितने ही पंचांग,वर्ष,
ऋतु परिवर्तित होते रहे ,
किंतु हम वही स्थिर हो गए
जहां पर तुमने मेरा परित्याग किया
उसी क्षण से सिर्फ अपने जीवन का ही नही
अपितु अपनी इच्छाओं, खुशियां,
मोह माया को भी मैंने विराम दे दिया
मैं आज भी ठहरी हूं उसी वर्ष के पल में
पर देखो ना.....
न जाने कितने ही तुम बिन
दिसंबर🍁बीत गए...
तेरे_होने_का_एहसास
पसंद है मुझे आज भी वो हर एक जगह
जहां मैंने तुमसे प्रेम भरे संवाद किए
तुम्हारे अनुराग में मन मनुहार की
फिर चाहे हल्की बारिश की बूंदों में
लंबी शांत सड़क पर गाड़ी चलाते हुए
तुमसे सोंधी,महकी बातें करना या
पूरे उजले चांद की चांदनी में ठंडी
सर्द रातों में छत पर तेरे कांधे पर
सर रख ना जाने कितने शब्दो को
प्रेम में पिरो कर तुझसे कह देना
जैसे हम सच में खुले आकाश में
एक दूसरे के नजदीक बैठे आंखो में
देखते हुए वो सब पढ़ ले रहे हो
जो कभी नही कह सके
सब सच ही तो लगता था
सिर्फ तेरी बातों से तो तेरे पास होने की
कल्पना कर लिया करती थी
मैं आज भी ठिठुरती रातों में छत पे बैठे
घंटो चांद से तेरी बाते कर लिया करती हूं
फिर उसी की थपकी से ना जाने कब
नींद केआगोश में सो जाया करती हूं...