चलो कोई बात नहीं
हम योंही निकल जाते हैं,
खिड़कियां-दरवाजे बन्द कर दो
हम योंही निकल जाते हैं।
कोई बात नहीं, चुप ही सही
हम योंही निकल जाते हैं,
राहें-रास्ते बदल लो
हम योंही ठहर जाते हैं।
आज हैं, कल नहीं
हम योंही निकल जाते हैं,
यादों-सांसों में बैठ
हम योंही निकल जाते हैं।
देखते-चाहते ,आश बाँधते
हम योंही गुजर जाते हैं,
बातों को खुजलाते- गाते
हम योंही निकल जाते हैं।
सच -झूठ के संग
हम योंही बदल जाते हैं,
फूल-काँटों के साथ
हम योंही निकल जाते हैं।
** महेश रौतेला