अल्फाज तो बहुत है मेरे पास,
पर कहने किस हैं यह समझ ना पाऊं।
रिश्ते तो बहुत है मेरे पास,
पर अपना कौन सा है यह समझ ना पाऊं।
दुनिया की भीड़ में मैं,
अकेली ही खड़ी हूं,
किसके पास जाऊं यह समझ ना पाऊं।
लोग आते हैं सुनाते हैं और चले जाते हैं,
मेरे लिए क्या है यह मैं समझ ना पाऊं।
सब मुझसे रुठे रुठे से रहते हैं,
किस-किस को मनाऊं समझ ना पाऊं।।
अब बस किसी से नहीं कहना कुछ,
बस खुद के लिए जीना यही समझ पाऊं।।