Hindi Quote in Poem by DrPranava Bharti

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इस प्रहर
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इस प्रहर में
अँधेरी गुफ़ा से
पुकारते कुछ शब्दों ने
नींद के झँगले खटोले से
टूलते क्षणों को
उठाकर, अचानक ही
बैठा दिया है....
स्वप्न नहीं आते हैं
स्वप्नों की छाया भर
रहती है टहलती
अर्धनिद्रा से अधखुली आँखों में
बहुत बार खींचा है
किया है प्रयास
लाई हूँ खींच खींचकर छाया
बनाने के लिए एक पूरा स्वप्न
जिससे हो सकूँ आनंदित
अपने सिर को धरे
नरम सिरहाने पर....
मुस्कुरा सकूँ
सतरंगे सपने में
मस्तिष्क की नसों को
सुना पाऊँ लोरी.....
धड़कनों को उठने,गिरने दूँ
मद्धम गति से
छू पाऊँ पूरे स्वप्न को
लरजते अहसासों से
मुग्ध हो सकूँ उन पर
प्रातः काल के झुरमुट में
नव लजाती वधू सा
उठा घुँघटा,भर सकूँ
एक गहरी श्वाँस.....
रह सकूँ पूरे दिन तरोताज़ा
प्रेम रँगों को उँडेल सकूँ
मस्तिष्क की नसों में....
किंतु नहीं हो पाता ऐसा
बोझिल क्षणों से झाँकते हुए
कुछ झटोके करने लगते हैं बंद
कवायद कराते हुए फिर से
झँगोले खटोले में
ला पटकते हैं.....
एक पूरे स्वप्न से
आनंदित हो
चैन से सोने का स्वप्न
लटकता है
एक पूरी,ख़ुशनुमा
प्यारी, मुस्कुराती
सहर की प्रतीक्षा में
आँखों में मुँदे कुछ
धारदार प्रश्न
अटके रह जाते हैं....
लो,एक प्रहर और
बीतता जा रहा है.....


शुभ रात्रि मित्रो
डॉ प्रणव भारती

Hindi Poem by DrPranava Bharti : 111906065
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