उग रहा सूर्य
प्राणियों में भरने लगा प्रकाश
हमने तोड़े हैं प्रण
घोला है विष।
ऊपजाऊ अतीत से
चुने हैं फूल
रखे हैं बीज।
हमने कई जन्मों को किया है प्यार
श्वेत लम्बाई से नापा है मन।
किसी दिन लिखा था पत्र
प्रिय को पाने के लिये,
की थी यात्रायें
अविनाशी अंश तक शुद्धता से।
हमारी निष्क्रियता से
पनपने लगे हैं भूत-पिचाश,
हम बहुत न कर सकें
पर सक्रिय तो कर सकते हैं विराट स्वरूप को।
* महेश रौतेला
१५.११.२२