*बदल गया है पिछले एक दशक में भारत*
हमने बचपन में अपने पीएम इंदिरा गांधी की हत्या होते देखी
किशोर उम्र में अपने प्रधानमंत्री राजीव गांधी पर श्रीलंका में राइफल के बट से हमला होते देखा।
वीपी सिंह को पीएम बनते और देश में अराजक स्थिति को देखा।
कश्मीर में आतंकवाद को बढ़ते और वटवृक्ष बनते देखा।
युवावस्था में वीपी सिंह सरकार से निराश राजीव गांधी में फिर उम्मीद की किरण देखी और उनकी हत्या होते देखा।
पीवी नरसिंह राव के समय देश की जर्जर स्थिति को देखा।
भारतीय पीएम राव को अमेरिका के सामने तिरस्कृत होते देखा।
अमेरिकी दबाव में रूस को धोखा देते देखा।
बाजपेई के शासनकाल में मुंबई पर हमला देखा
करगिल में पाक घुसपैठ को देखा ,उस युद्ध में भारत को पश्चिम और अमेरिका के हाथों उपेक्षित देखा।
बाजपेई के शासनकाल में दर्जन भर बीएसएफ जवानों को बांग्लादेशी बीडीआर के हाथों शहीद होते और जानवरों की तरह बांस पर शव टांग कर लाते देखा।
मनमोहन सिंह को देहाती औरत उपनाम से तिरस्कृत होते देखा।
चीन का बयान सुना कि भारत को 56 टुकड़ों में बांट देना चाहिए।
जर्मनी, ब्रिटेन, अमेरिका, फ्रांस, चीन, जापान से बार बार भारत और भारतीय नेतृत्व का उपहास देखा।
जब आज भारत के सामने पश्चिम और युरोप को नतमस्तक और हाथ फैलाये देखता हूं तो ये मुझे बड़ा बदलाव लगता है जो बेशक 2014 के बाद आया है।
मैने ओबामा, ट्रंप, बिडेन को भारतीय पीएम के सामने कमतर देखा है।
जर्मनी की एंजेला मर्केल को पीएम के सामने दांतें निपोरते देखा ।
फ्रांस,जापान, आस्ट्रेलिया समेत पूरे पश्चिम को भारत के आगे मुलायम होते देखा।
कोरोना के समय वैक्सीन के लिये भारत के आगे सबों को हाथ फैलाये देखा।
जिस करगिल युद्ध के समय अमेरिका ने सैटेलाईट विजन देने से मना किया था उसी अमेरिका को सारे आधुनिक आयुध भारत को देने को लालयित देखा।
युक्रेन युद्ध में यूरोप और अमेरिका को ताल ठोक कर अपनी मर्जी थोपते भारत को देखा।
भारत को पहली बार पाकिस्तान में चढ़ कर सर्जिकल स्ट्राइक करते देखा।
गलवान झड़प के बाद चीन को हताश और बैकफुट पर देखा।
इन बदलावों की चर्चा पर आप मुझे अंधभक्त कह सकते हैं, पर इन वाक्यों को नकार नहीं सकते।
बस कुछेक वाक्यों पर सरकार के संयम से अफसोस भी रहा । फिर भी आज 76वें स्वतंत्रता दिवस पर मन से जिलेबी खाना तो बनता ही है।