न जाने यह कैसा कर्म का लेखा-जोखा है हमारी बिच,
मेरे हंसकर कहे हुए शब्दों भी उन्हें तानों से कम नहीं लगते,
और कोई सरासर उनका कोई अपमान कर जाएं,
फिर भी मोहब्बत उन पर खूब बरसाती है,
जिन्हें उनकी फिक्र तक नहीं,
उसके लिए वह जान तक देने को तैयार है,
और रात -दिन उसके साथ रहकर भी,
हमें बहुत पराया समझती है,
कल को यह आंगन तेरा छोड़ जाउंगी,
फिर कौन हमें परेशान करेगा,
और कौन फिर हमारे रोएगा?
मैत्री बारभैया