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नकाब
बच्चपनमे,सरकस में हमने देखा ही है, जोकरों को; लगाते है वो ढ़ेर सारे नकाब ।
और बच्चों को उनकी करामात प्रदशित कर के, उत्पन करते हैं उनमें अनगिनत ख्वाब ।
पर हमारे निजी जीवन में भी, हमारे असली चेहरे पर होते है, दो या तीन नकाब ।
असली चेहरा हमारा, हम छुपा के रखते है, पर दिख जाती है कभी कभार, हमारी असली झलक !
बाहरवाले देखते है हमारा नकाब, जो पहनके, उन्हे हम दिखाना चाहते है, एक जूठी झलक।
इंसान कितने भी चेहरे मोहरे बदले; सच्चाई देख सकता है हमारा रब, क्योंकि विशाल है फलक।
लाख छुपाएं हम अपनी असलियत, वो तो देख ही लेता है, भांप ही लेता है हमारी असलियत।
पर्दा कितना भी कीमती और हसीन क्यों न हो, पर रबकी आंखे है तीक्ष्ण, देख लेती है हर किसी की असलियत ।
तो फिर हम इंसान, क्यों पहनते है यह नकाब? शायद दूसरों को पता नहीं चल सके हमारी असलियत ।
Armin Dutia Motashaw