दिसंबर की इन सर्द रातों में...
मैं रोज उसके लौट आने कि उम्मीदों के साथ रजाई में सो जाता हूँ.
मैंने आज भी संभाल के रखी हैँ बिस्तरो पर पड़ी वो सिलबटे.. जो कभी मैंने और उसने एक दूसरे कि बांहों में समा कर बनाई थी.
आज भी तकिये से आती है उसकी जुल्फों की खुसबू जिसे मैं हर रोज अपनी साँसो में उतार लेता हूँ.
आज भी उस रजाई में उसके जिस्म की वो गर्माहट मोज़ूद है जिसे हम दोनों ने अपने जिस्मो की आग को ठंडा करने के लिए दहकाया था.
आज भी बेड पर बिछी उस सफ़ेद चादर से उसके पसीने महक आती है.
आज भी उसकी टूटी हुई चूड़ी के एक टुकड़े से खनक आती है.
मैंने उस चूड़ी के टुकड़े को बड़ी हिफाज़त से थाम रखा है
मैंने रोज उसी टुकड़े से अपनी कलाई को काट -काट कर अपने खून से उसका नाम लिखा है.
Anshu khan