*सुप्त देवत्व का पुर्नजागरण*
मनुष्य के वर्तमान चरित्र का गहनतापूर्वक अध्ययन करने से यही निष्कर्ष निकलता है कि सृष्टिचक्र के आदि काल में उसके चरित्र में देवत्व विद्यमान था जो जन्म-जन्मान्तर पांच विकारों के चंगुल में फंसते फंसते चारित्रिक गिरावट के कारण आज सुप्त अवस्था में जाकर मूर्छित सा हो गया है ।
बर्हिमुखता का संस्कार नैसर्गिक होने के फलस्वरूप औरों के अवगुण देखते देखते मनुष्य स्वयं ही अवगुणों का भण्डारग्रह बन गया है । अन्तर्चेतना में विद्यमान दिव्य गुणों रूपी हीरे, पन्नों, माणक, मोतियों के ऊपर विकारों और अवगुणों रूपी धूल, मिट्टी व कचरे का ढ़ेर आच्छादित होने के कारण इन गुणों की चमक व्यक्ति के आचरण, व्यवहार व चरित्र को देदीप्यमान नहीं कर पा रही ।