मैं हिन्दी का अध्यापक हूं लेकिन मेरे बच्चे इंग्लिश स्कूल में पढ़ते हैं। इस पर मुझे शर्म बिलकुल नहीं आती। जब मैं किसी ग़ैर-हिन्दी वाले को हिन्दी बोलते, हिन्दी सिनेमा पर बात करते देखता हूं तो मुझे ख़ुशी ज़रूर होती है। जब मैं किसी विदेशी को गंगा घाट पर रामनामी ओढ़े देखता हूं तो उसे नमस्ते बोलता हूं। वह भी पूरे सम्मान के साथ मेरा अभिवादन करता है। मैं जर्मनी की रोज़ी और अमेरिका के हर्मिट बाबा को बीस वर्षों से अधिक समय से देख रहा हूं। हर्मिट बाबा दाढ़ी रखकर, भगवा वस्त्र पहनकर तत्समयुक्त हिन्दी में सबसे बातचीत करते हैं। इज़राइल का एक लड़का (उसका नाम याद नहीं) जो नगवा में रहता है, फर्राटे से भोजपुरी बोलता है। वह तमाम विदेशियों को हिन्दी सिखाता है।
विश्वनाथ गली में पूजा-सामग्री, ज्वेलरी, माला-फूल बेचने वाले दुकानदार दर्ज़नों देशी-विदेशी भाषा बोलते हैं। उनका यह हुनर उनकी आमदनी में सहायक है। इससे वे हर दृष्टि से समृद्ध होते हैं।
मुझे ख़ुशी होती है जब एक गुजराती प्रधानमंत्री वैश्विक मंच पर दुनिया को हिन्दी में संबोधित करता है। मुझे जैक्लीन फर्नांडिस और कैटरीना कैफ़ की भी हिन्दी अच्छी लगती है। लेकिन अच्छा नहीं लगता जब फर्राटेदार हिन्दी बोलने वाले कंधा उचकाकर खींस निपोरे अंग्रेज़ी की बैसाखी पर लटक जाते हैं।
मैं राजकपूर, दिलीप कुमार, अमिताभ बच्चन को पसंद करता हूं इसका कदाचित यह अर्थ नहीं कि एम.जी. रामचन्द्रन और शिवाजी गणेशन से मुझे नफरत है। इसका यह भी मतलब नहीं कि सत्यजीत राय और रबीन्द्र नाथ टैगोर मुझे भाते नहीं। यह तिकड़म राजनेताओं के काम की चीज़ है, यह हमारे आपके किसी काम नहीं आने वाली। मैं अपनी मां का पूरे गर्व से सम्मान करता हूं और साथ ही चाहता हूं कि दूसरों की मां के सम्मान पर जरा भी आंच न आने पाए।
मनसे का राज ठाकरे, शिवसेना के गुंडे, और गुजराती ठाकोर हिन्दीभाषी मज़दूरों, रेहड़ी वालों, आॅटो ड्राइवरों पर जब लाठियां भांजते हैं तो ह्रदय विदीर्ण हो जाता है। अपनी भाषा और अपनी दरिद्रता पर तब मुझे पीड़ा पहुँचती है।
मुझे शर्म तब आती है जब अपने पुरखों के बारे में सोचता हूं। पोपला मुँह, झुराया बदन लेकर वे कचहरियों की धूल फांकते बिदा हो गये, लेकिन अरबी-फारसी उनके पल्ले न पड़ी। मुझे दुःख तब होता है जब लेखपाल और पटवारी गुनिया के ग़लत इस्मेताल से ज़मीन का बंदरबांट करते हैं। वे रेवेन्यू की भाषा समझते हैं। वे प्रशासनिक अधिकारियों को ठेंगे पर रखते हैं। वे जानते हैं, देश की प्रतिष्ठित परीक्षा उत्तीर्ण करके रूतबा झाड़ने वाले अफ़सर उनके सामने बिलकुल जाहिल हैं।
मुझे दुःख होता है जब सामान्य दरख़्वास्त लिखवाने के लिए एक ग़रीब मुवक्किल वकील को दो सौ रूपये देकर उसके आगे हाथ जोड़कर अपनी दीनता प्रदर्शित करता है। उसे नहीं मालूम किन शब्दों का प्रयोग किया जाय, किस शब्दावली में अपनी बात रखी जाय ?
हिन्दी के लिए जै जैकार करने वालों की कचहरी और तहसील इन दिनों सोशल मीडिया पर लगती है।ख़सरा-ख़तौनी की इनकी अपनी भाषा है।ये पलक झपकते हमें सदियों की ग़ुलामी से आज़ाद कराने आये हैं।मैं इसे आज़ादी नहीं मानता।