मर चुकी हूँ शायद मैं ,
फर्क नही पड़ता किसी की
दुत्कार से , भूल जाती हूँ
कुछ दिन बाद ही , रह जाता है
अन्तर प्रेम या आत्मीयता ही |
या शायद कमजोर हूँ अन्दर से,
निभा न पाती सामने से मिली रार को,
नही सहेज पाती खुद में अहं भाव को ,
शायद ! नजर मे मेरी अन्तर रिश्तों में,
इनका कोई स्थान नही |