सुन मन ! मै तेरी चंचलता ,
तेरी लोलुपता को नही पूजती ,
तेरे दोगले पन से दूर सही ,
तेरी पल पल बदल जाने वाली
प्रवृत्ति से मै दूर सही,
झूठ ,छल,कपट लेकर मेरे पास
भी मत फटकना |
जा !चला जा ! तुझे जहाँ जाना है
अपनी क्षुद्र प्रवृत्ति लेकर,
मत आना मुँख मलिन लेकर,
मेरे पास आना तो भगवतधाम बनकर ,
माँ प्रंबा की शक्ति का अल्पविराम बनकर |
भगवान शिव के गले की माला बनकर ,
भगवान वासुदेव का कमल बनकर ,
भगवान ब्रम्हा का कमण्डल बनकर,
इन सब मे रमती भावना का
प्राणवल्लभ बनकर |