इस से हूं इस में ही, मिलना पड़ेगा मुझे।
इसी लिए खुद को, न्यौछावर करता हूं मैं।।
“लेती है बलिया मेरी, मातृभूमि दुलरा के,
इसीलिए इसको दुलार करता हूं मैं।
होती है थकान कभी,
इसके ही आंचल में।।
लेटकर बातें कई,
बार करता हूं मैं।
और माथे का पसीना,
मेरा चूमती है मातृभूमि।।
इसीलिए इसको ही,
प्यार करता हूं मैं।” – © जतिन त्यागी