अगर हम, खुदको इस मुकाम तक ले सके,
जहा
गेर भी, हमारी तारीफ करते हुए, हमारी मिसाल दे सके
तो हमारे जिंदा होनेकी, बात ही कुछ और है.
मगर...मगर...ये तभी हो सकता है,
कि जब हम, दूसरो की जरूरतों, पसंद-नापसंद को प्राधान्य दे सके.
क्योंकि,
जब हम दूसरो की, जरूरतों के लिए, कोई काम करते हैं, या फिर, अच्छा सोचते भी हैं,
तब,
कोई अज्ञात शक्ति, हमारी जरुरतो के लिए, अपनेआप काम करने लगती हैं.
Shailesh Joshi લિખિત વાર્તા "ઈન્સ્પેક્ટર ACP - સસ્પેન્સ ક્રાઈમ થ્રીલર - 9" માતૃભારતી પર ફ્રી માં વાંચો
https://www.matrubharti.com/book/19923872/ispector-acp-9