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Aap sabhi ko 15 august ki hardik shubhkamnaye
आत्मप्रकाश महाकाव्य सर्ग प्रथम : मंगलाचरण एवं सृष्टि का उद्गम लेखक – संदीप बिन्द ॥ मंगलाचरण ॥ नमन करूँ उस सत्य प्रभु को, जिसका न आदि न अंत। जिसकी इच्छा से प्रकट हुआ, यह असीम ब्रह्म अनंत॥ जो कण-कण में स्वयं विराजे, फिर भी सबसे दूर। जिसके सम्मुख सूर्य-चंद्र भी, लगते क्षीण और नूर॥ वाणी जिसकी सीमा न पाए, वेद करें गुणगान। ऋषि-मुनि जिसका ध्यान लगाएँ, वही परम भगवान॥ अंधकार जब व्याप्त जगत में, न नभ था, न धरती। न काल, न गति, न शब्द कहीं, केवल उसकी सत्ता थी॥ न दिन था, न ही रात्रि कोई, न जल, न पवन, न आग। शून्य नहीं, वह पूर्ण चेतना, वही सृष्टि का भाग॥ उसने सोचा—"हो प्रकाश अब", और ज्योति प्रकट हो आई। तम के गहरे मौन हृदय में, जीवन की लहर समाई॥ जन्म लिया तब काल महान ने, चल पड़ा सृष्टि का चक्र। क्षण-क्षण में इतिहास रचा, खुला सृजन का यज्ञ॥ आकाश प्रथम विस्तृत होकर, बाँहें अपनी फैलाए। उसकी गोदी में असंख्य लोक, तारक दीप जलाए॥ वायु चली जीवन का संदेशा लेकर हर दिशा। जल ने धोया जग का चेहरा, बनी करुणा की भाषा॥ अग्नि बनी ऊर्जा का स्रोत, तेजस्वी उसका रूप। पृथ्वी ने सबको आश्रय देकर, धारण किया स्वरूप॥ पंचमहाभूतों से मिलकर, बना यह अद्भुत संसार। हर कण में ईश्वर मुस्काता, हर श्वास में विस्तार॥ वन, उपवन, पर्वत, नदियाँ, सागर का गंभीर गान। सबमें गूँज रहा था केवल, ईश्वर का पावन नाम॥ पक्षी गाते मधुर प्रभाती, पवन सुनाए तान। प्रकृति स्वयं आरती उतारे, जग के पालनहार॥ तब प्रभु ने अपने अंशों से, मानव तन का सृजन किया। मिट्टी में चेतन दीप जलाकर, जीवन का वरण किया॥ कहा—"मनुष्य! तुझमें मेरी दिव्य ज्योति निवास करेगी। तेरे कर्मों से ही तेरी, जीवन-गाथा लिखी जाएगी॥ सत्य रहेगा तेरा आभूषण, करुणा होगा मान। धर्म-पथ पर जो चलता जाएगा, वही बनेगा महान॥ पर यदि लोभ और क्रोध घिरेंगे, भूल जाएगा ज्ञान। तब जन्मों का चक्र चलेगा, जब तक न हो पहचान॥ याद रखो—तुम देह नहीं हो, अमर आत्मा हो तुम। मैं ही तुममें, तुम ही मुझमें, यही सनातन क्रम॥ जब मन निर्मल, कर्म पवित्र, और हृदय हो निष्काम। तब हर प्राणी में दिखता है, केवल मेरा धाम॥ हे मानव! जग क्षणभंगुर है, मत करना अभिमान। साथ न जाएगा धन-दौलत, साथ चलेगा ज्ञान॥ प्रेम बाँटो, सेवा कर लो, यही अमर उपहार। इसी पथ पर चलकर होगा, जीवन का उद्धार॥ जब-जब धर्म डगमगाएगा, मैं धरती पर आऊँगा। राम बनूँगा, कृष्ण बनूँगा, शिव-तत्त्व जगाऊँगा॥ भक्ति बनेगी जीवन-धारा, कर्म बनेगा सेतु। ज्ञान बनेगा सूर्य दिवाकर, मिट जाएगा हेतु॥ इस प्रकार सृष्टि का आरंभ हुआ, गूँजा ॐ का गान। हर कण बोला एक स्वर में— "सर्वं खल्विदं ब्रह्म।" ॥ इति सर्गः प्रथमः ॥
हमारा समाज समाज हमारा आईना है, इसमें हर इंसान दिखाई देता है। कोई दुख में साथ निभाता है, कोई बस अपना फायदा देखता है। जहां कभी प्यार की बातें होती थीं, आज वहां दूरी बढ़ जाती है। छोटी-छोटी बातों पर अक्सर, इंसानियत पीछे छूट जाती है। गरीब की मेहनत को सम्मान मिले, हर बेटी को आगे बढ़ने का अधिकार मिले। जाति-भेद की दीवारें टूटें, हर दिल में प्यार का संसार मिले। बदलाव की शुरुआत खुद से करें, अच्छे कर्मों की राह चुनें। समाज तभी महान बनेगा, जब हम मिलकर इंसान बनें। "इंसान की पहचान उसके नाम से नहीं, उसके अच्छे काम से होती है।" रचयिता : "संदीप बिन्द "
प्रकृति महाकाव्य भाग–1 : सृष्टि का प्रथम प्रभात जब न समय का कोई बंधन था, न दिशाओं का कोई नाम, जब मौन स्वयं ध्यान में लीन था, न था जीवन, न था धाम। तब शून्य की असीम निस्तब्धता में, एक दिव्य स्पंदन जागा, अनंत चेतना की पहली लहर ने सृष्टि का स्वर्णिम द्वार खोला। उस प्रथम स्पंदन से जन्मी ज्योति, ज्योति से नव विश्वास हुआ, विश्व-वृक्ष की पहली कोंपल फूटी, जीवन का मधुमास हुआ। गगन ने फैलाई नीली चादर, धरती ने आँचल फैलाया, प्रेमिल प्रकृति ने अपने कर से जग का प्रथम श्रृंगार सजाया। अरुण किरण की प्रथम मुस्कान जब पूर्व दिशा से झाँकी थी, ओस-बिंदुओं की प्रत्येक लड़ी मानो नभ से उतरी पाँखी थी। हर तिनका स्वर्णिम दीप बना, हर पत्ता मोती-सा चमका, मानो ईश्वर ने रंगों से नव सृष्टि का चित्र स्वयं रच डाला। धीरे-धीरे मंद पवन ने जीवन-वीणा को छेड़ दिया, सोए हुए उपवन के मन में नव उल्लास का भेद दिया। फूलों ने खोलीं पंखुड़ियाँ, सुगंध बनी मधुमय भाषा, भँवरों ने गाया प्रेम-गान, मुस्काई हर मधुर अभिलाषा। नील गगन की असीम गोद में सूरज स्वर्ण-विभूषण पहने, रश्मि-रथ पर आरूढ़ हुआ वह जग के तम को हरने। उसके तेज से पर्वत जागे, नदियों ने कल-कल गान किया, धरती माँ ने पुलकित होकर जीवन का अभिनंदन किया। चिड़ियों के कोमल कंठों में जैसे वेदों की ऋचाएँ थीं, कोयल की मधुर पुकारों में अनगिन मंगल-कामनाएँ थीं। मोर-पंख पर इंद्रधनुष ने अपने सातों रंग सजाए, प्रकृति ने अपने हर कण में सौंदर्य के दीप जलाए। धरती बोली—"मैं जननी हूँ, सबको जीवन देना मेरा धर्म, बीजों में भविष्य छिपा है, प्रेम ही मेरा शाश्वत कर्म। जो मेरी गोद सँभालेंगे, मैं उनके सपनों को सींचूँगी, जो मुझसे प्रेम निभाएँगे, मैं उनके जीवन में हरियाली बुनूँगी।" सरिता बोली—"बहना सीखो, रुकना जीवन का पंथ नहीं, पत्थर से टकराकर भी मुस्काना ही सच्चा संत नहीं। मैं गिरि से सागर तक जाती, अपना सब कुछ अर्पण करती, निस्वार्थ भाव से बहते-बहते, जग की हर प्यास स्वयं हरती।" पर्वत बोला—"धैर्य धरो तुम, आँधी आए या तूफ़ान, जो अपने आदर्शों पर टिके, वही कहलाता है महान। ऊँचाई केवल शिखरों में नहीं, चरित्र की दृढ़ता में होती, सच्ची विजय उसी की होती, जिसकी नीयत निर्मल होती।" और तभी... क्षितिज के उस पार से एक नई कथा जन्म लेने लगी— वनों की, नदियों की, ऋतुओं की, जीवन की अनंत लय की... और तभी क्षितिज की गोद से स्वर्णिम उषा मुस्काई, मानो स्वयं सृष्टि की जननी मंगल आरती गाने आई। उसके चरणों की आहट पाकर सोया उपवन जाग उठा, हर पत्ती ने ताली बजाई, हर अंकुर नव अनुराग उठा। अरुणिम आभा के आँचल ने धरती का श्रृंगार किया, हर तिनके को स्वर्णिम करके जीवन का सत्कार किया। नभ ने नीली चादर ओढ़ी, सूरज ने मुस्कान बिखेरी, मंद पवन ने प्रेमिल स्वर में हर डाली पर वीणा छेड़ी। दूब-दूब पर ओस की बूँदें मोती बनकर झिलमिलाईं, मानो नभ की अप्सराओं ने धरती पर माला बरसाई। फूलों ने मुस्काकर बोला— "जीवन का संदेश यही, क्षणभर का यह सुंदर जीवन, प्रेम लुटाओ, द्वेष नहीं।" गुलाब ने अपनी सुगंधों से मन का हर अँधियारा हर लिया, कमल ने कीचड़ में खिलकर पावन जीवन का अर्थ दिया। चंपा, चमेली, पारिजात, हर पुष्प बना उपदेशक था, मौन खड़ा हर वृक्ष यहाँ मानो कोई महादेश था। पीपल बोला—"श्वास बचाओ, मैं ही जीवन का आधार।" बरगद बोला—"जड़ से जुड़कर मिलता है सम्मान अपार।" नीम हँसकर कहने लगा— "कड़वाहट भी औषधि होती, सत्य कभी-कभी कठोर सही, पर अंततः मंगल ही होती।" उधर दूर हिमगिरि की चोटी रवि-किरणों से दमक रही थी, मानो योगी ध्यानमग्न होकर ईश्वर से बातें कर रही थी। उसकी हिम-श्वेत पवित्रता में त्याग-तपस्या का था वास, उसकी निस्तब्धता सुनाती अनगिन युगों का इतिहास। उसी हृदय से जन्मी सरिता कल-कल करती बह निकली, पत्थरों से टकराकर भी मुस्काती हुई आगे निकली। उसने गाकर यही सुनाया— "रुकना मेरा धर्म नहीं, जो जीवन में चलते रहते, उनके लिए असंभव कुछ नहीं।" मंद समीर बहती जाती, हर थके मन को सहलाती, बिना किसी प्रतिफल की आशा स्नेह-सुगंध लुटाती जाती। कोयल की मधुरिम तानों से वन का कण-कण गूँज उठा, भँवरों के मृदु गुंजन से फूलों का मन भी झूम उठा। मोर पंख फैलाकर बोला— "जब बादल का प्यार मिलेगा, सूखी धरती का हर कण भी फिर नवजीवन से भर जाएगा।" प्रकृति का प्रत्येक कण जैसे जीवन का गुरुकुल बन बैठा, जो भी इसके पास ठहरा, ज्ञान का सागर वह ऐंठा नहीं, विनम्र होकर लौटता। किन्तु... समय की धारा में कहीं एक नया अध्याय भी लिखा जा रहा था। जहाँ प्रकृति का यह अनुपम वैभव मानव की परीक्षा लेने वाला था... सागर बोला मंद लहर से—"गहराई का मोल समझना,ऊपर उठती हर लहर सेअंतर का भी बोल समझना। जो जितना गंभीर बनेगा,उतना ही विशाल कहलाए,अहंकारों की नाव सदा हीमध्य भँवर में डूबती जाए।" अंबर ने तब बाँहें फैलाकरधरती को आशीष दिया,सूरज ने स्वर्णिम किरणों सेजीवन का नव बीज दिया। संध्या आई लाल चुनरियाधीरे-धीरे ओढ़े हुए,दिनभर के श्रम से थके गगन कोस्नेहिल स्पर्श से जोड़े हुए। चंदा अपने रजत रथ परनभ के पथ से उतर पड़ा,तारों की दीपावली लेकररजनी का उत्सव निखर पड़ा। जुगनू छोटे दीप बनाकरअँधियारे से युद्ध करें,संदेश यही संसार को दें—"छोटे होकर भी प्रकाश भरें।" रात नहीं केवल अंधकार,वह तो चिंतन का आलय है,जो स्वयं से मिलने निकले,उसके लिए यही शिवालय है। दूर किसी वन की निस्तब्धता मेंऋषियों का तप गूँज रहा था,वेदों का पावन उच्चारणपवन-पवन में घूम रहा था। यज्ञाग्नि की उठती ज्वालाआकाशों को छू लेती थी,हर मंत्रध्वनि मानव-मन कीमलिनता को धो देती थी। गौओँ की मधुर रंभाहट मेंममता का अमृत बहता था,निर्मल बालक की मुस्कानों मेंईश्वर स्वयं ही रहता था। धरती का प्रत्येक कण तबतीर्थ समान पवित्र बना,हर वन, हर उपवन, हर सरितामानो देवालय चित्र बना। प्रकृति केवल दृश्य न थी,वह चेतन का विस्तार बनी,कण-कण में परमात्मा कीअद्भुत, अमर झंकार बनी। किन्तु समय कभी रुकता कब है?युग की धारा चलती जाती,नई सभ्यताओं के संग-संगनई कहानी जन्मी आती। मानव आया बुद्धि लिए,स्वप्न लिए, विज्ञान लिए,पर उसके भीतर छिपा हुआलोभ भी था, अभिमान लिए। जिस धरती ने जन्म दिया था,क्या वह उसका मान रखेगा?या अपने ही स्वार्थों मेंउसका हर वरदान हर लेगा? क्या वन फिर भी गान सुनाएँगे?क्या नदियाँ निर्मल बह पाएँगी?क्या पर्वत की गौरव-गाथाआने वाली पीढ़ी गाएगी? इन प्रश्नों को हृदय में लेकरउषा मौन खड़ी रह जाती,पवन किसी अनजाने भय सेधीरे-धीरे सिसकन गाती। पर आशा का दीप बुझा नहीं,विश्वास अभी भी जीवित था,क्योंकि हर नवजात शिशु की आँखों मेंप्रकृति का भविष्य लिखित था। यदि मानव फिर प्रेम चुनेगा,वन फिर हरियाली ओढ़ेंगे,सूखी धरती के अधरों परमेघ अमृत की बूँदें छोड़ेंगे। यही प्रथम प्रभात का व्रत था,यही सृष्टि का पहला गान,प्रकृति ही जीवन की जननी,प्रकृति ही मानव की पहचान
"Whispers of the Dawn" The darkest hours always fade away, To give their place to a brighter day. The fallen leaves upon the ground, Are where new seeds of life are found. So take a breath and raise your eyes, Beneath the vast and endless skies. No step is small, no dream too high, When you decide to reach and fly. Let go of doubt, embrace the breeze, Walk through the wild with gentle ease. For every ending brings a start, A brand new chapter for your heart. by Sandeep Bind
The Echo of You I watch the shadows softly lean, In quiet spaces left between. The moments come, the moments go, With secrets only hours know. I trace the lines of every thought, And all the lessons time has taught. Yet through the noise, both far and near, It’s only you I wait to hear. Like rivers searching for the sea, Your distant echo reaches me. And till the day our pathways meet, This silent waiting stays complete.
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