धुप की गर्द को,
जब पोंछ के पंखों से परिंदे
आशियानों कि तरफ़ लौट के आते हैं
ज़मीं पर
और पलकों कि तरह शाम उतरती है
फ़लक से
रात आती है
बुझा देती है,
सब रंगों के चेहरे
अपने दरवाज़े पे इक लौ का लगा देता हूँ टीका
तुम अगर लौट के आओ,
तो ये दरवाज़ा न भूलो.....
By courtsey:-
m.vadodaria
🙏