तुम्हारी बात का
कोई किनारा दबा हुआ है,
तुम्हारे पैर का
कोई कदम रूका हुआ है,
तुम्हारे हाथ का
कोई स्पर्श सहमा हुआ है,
तुम्हारी मुस्कान का
कोई किनारा छूटा हुआ है,
तुम्हारे नाम के
अक्षर-अक्षर उखड़े हुये हैं,
तुम्हारी बात का
कोई किनारा दबा हुआ है।
*महेश रौतेला
२०.०७.२०१५