हर्याव( हरेला) मेरे गाँव का :
"जी रया, जागि रया, यो दिन यो मास भेटनै रया,
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गंग ज्यु पाणि तक अमर रैया।"
संक्षिप्त में कहा जाता है-
"जी रया, जागि रया,
गंग ज्यु पाणि तक अमर रैया।( जीते रहना, जीवन्त रहना, गंगा जी के जल तक अमर रहना)।"
बचपन में हरेले का त्योहार सजीव रूप में अवतरित होता है। टोकरी में खेत से शुद्ध मिट्टी लेकर घर के अँधेरे कोने में रख कर अलग-अलग प्रकार के बीज उसमें बो देते हैं। शाम को रोज हाथ-पैर धोकर टोकरी में जल दिया जाता है। कभी-कभी माता-पिता बच्चों से पूछते हैं," हर्याव गैं पाणि दय छ नैं?( हरेले को जल दिया या नहीं)" नौ दिन में पीला,हल्का हरा हरेला तैयार हो जाता है।सावन की प्रथम तिथि को उसे काटा जाता है। यह सावन उत्तराखंड के पंचांग जो सूर्य पर आधारित है, के अनुसार होता है।इसे काट कर आशीर्वाद स्वरूप सिर में रखा जाता है, अमरता और सम्पूर्णता के भाव के साथ। बच्चों को पैर से आरंभ कर हरेले को घुटनों,पेट,छाती को छूते हुये सिर पर रखा जाता है या कान के पीछे रख स्थायित्व दिया जाता है और साथ-साथ कहा जाता है-
"जी रयै, जागि रयै, यो दिन यो मास भेटनै रयै, ----
गंग ज्यु पाणि तक अमर रैयै।"
संक्षिप्त में कहा जाता है
"जी रयै, जागि रयै,
गंग ज्यु पाणि तक अमर रैयै।
हरेले के पौधे दरवाजों पर लगाये जाते हैं जो बहुत समय तक हरेले को मन में जीवित रखते हैं।
महिलाएं अपनी लम्बी लटी पर भी इसे बाँधते हैं।
चिट्ठियों( लिफाफों) में हरेला दूर-दूर तक अपने छोटे-बड़ों को भेजा जाता है। अपने साथ अमरता का भाव और आशीर्वाद लेकर। इसे पत्र द्वारा प्राप्त करने वाला असीम आनन्द की सुगबुगाहट महसूस करता है।
हमारे ग्रन्थों में सात अमर पुरुषों का वर्णन होता है।
सात अमर पुरुष हनुमानजी, पशुराम जी, विभीषण, वेदव्यास,कृपाचार्य,अश्वत्थामा और राजा बलि हैं। अमरता का सिद्धांत हमारे पूर्वजों को ज्ञात रहा होगा। पदार्थ भी अमर है।
झगड़ा होने पर, क्रोध की मनोस्थिति में बोला जाता है," त्यार ख्वार हर्याव नि जा ल( तेरे सिर हरेला नहीं जायेगा।)"
मनुष्य आदिकाल से विशिष्ट आनन्द की खोज में रहा है। उसे वह त्योहारों,तीर्थों आदि में ढूंढता रहता है। हरेले को पर्यावरण की दृष्टि से भी देखा जाता है। हरेले के पौधों को सिर पर रखकर हम अमरता की कामना करते हैं जो एक बृहद जीवन दर्शन की ओर हमें ले जाता है।
"काम की लौ शेष है
चल पथिक, चल निकल
राह बहुत शेष है,
श्रम निराला,चमक अद्भुत
कर्म की लौ शेष है।
हम धरा से पूछते हैं
किस जगह पर प्यास है!
इस हस्त में कर्म है
काम की लौ शेष है।
कर्म अद्वितीय पाठ है
स्नेह का आवास है,
जब तक जीवन आनन्द है
त्योहार की लौ शेष है।"
** महेश रौतेला